जब भारत में नहीं थे फ्रिज नहीं था तब कैसे मिलती थी बर्फ, मुगल कैसे ठंडा करते थे शरबत और मिठाइयां

प्राचीन काल की एक बेहद अनोखी और छिपी हुई तकनीक आज के रेफ्रिजरेटर को भी मात देती है. पहाड़ों के एक खास हिस्से से महलों तक पहुंचने वाली इस ठंडी बर्फ के पीछे खास तकनीक छिपी हुई है.

Jun 1, 2026 - 19:59
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जब भारत में नहीं थे फ्रिज नहीं था तब कैसे मिलती थी बर्फ, मुगल कैसे ठंडा करते थे शरबत और मिठाइयां

आज के आधुनिक दौर में भीषण गर्मी से राहत पाने के लिए हमारे पास फ्रिज, एयर कंडीशनर और आइस मेकर जैसी तमाम सुविधाएं मौजूद हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सदियों पहले जब बिजली का नामोनिशान नहीं था, तब भारत के राजा-महाराजा और मुगल बादशाह गर्मियों में ठंडा पानी कैसे पीते थे? उस दौर में राजघरानों के लिए न सिर्फ ठंडे पानी बल्कि असली बर्फ का भी पूरा इंतजाम किया जाता था. चिलचिलाती धूप में भी शाही रसोइयों में ठंडे शरबत, कुल्फी और मिठाइयां परोसी जाती थीं. बिना किसी आधुनिक मशीन के बर्फ को बनाने, उसे दूर-दूर से मंगाने और महीनों तक सुरक्षित रखने के पीछे का विज्ञान बेहद हैरान करने वाला है

मुगलकाल में गर्मियों के दौरान बर्फ हासिल करने का सबसे मुख्य जरिया उत्तर भारत के ऊंचे और बर्फीले पहाड़ हुआ करते थे. हुमायूं और अकबर के शासनकाल के दौरान कश्मीर, हिमाचल और गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों से दिल्ली और आगरा तक बर्फ लाने की पूरी व्यवस्था मौजूद थी. सर्दियों के मौसम में पहाड़ों पर जमी प्राकृतिक बर्फ को बड़े-बड़े टुकड़ों में काटा जाता था. इसके बाद खास रास्तों और नावों के जरिए इस बर्फ को बेहद तेजी से दिल्ली के पास यमुना नदी के किनारों तक पहुंचाया जाता था, ताकि रास्ते में वह पिघल न जाए.

भूमिगत बर्फघरों की अनूठी तकनीक

लाए गए बर्फ के इन विशाल टुकड़ों को गर्मियों के अंत तक सुरक्षित रखने के लिए मुगलों ने दिल्ली, आगरा और लाहौर में विशेष 'बर्फघर' बनवाए थे. ये असल में जमीन के नीचे बने गहरे गड्ढे या तहखाने होते थे, जिनकी दीवारें बहुत मोटी और इंसुलेटेड बनाई जाती थीं. इन तहखानों में बर्फ को रखने के बाद उसे भूसे, राख, जूट की बोरियों और मोटे कपड़ों में अच्छी तरह लपेटकर दबा दिया जाता था. यह प्राचीन इंसुलेशन तकनीक बाहर की गर्मी को अंदर नहीं आने देती थी और बर्फ महीनों तक बिना पिघले वैसी ही बनी रहती थी.

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