स्कूल हो या अस्पताल, अगर अवैध इमारत में बनी है तो गिराओ... मेरठ मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

जस्टिस जे. बी. पारदीवाला ने कहा कि यह एक आई ओपनर है, यह सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं कि पूरे देश के लिए है कि जहां राज्य सरकार अपना काम सही समय पर अपना काम करें तो इस तरह की समस्या नहीं आए ही नहीं.

Apr 9, 2026 - 17:30
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स्कूल हो या अस्पताल, अगर अवैध इमारत में बनी है तो गिराओ... मेरठ मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

नई दिल्ली: मेरठ में भारी संख्या में हुए अवैध निर्माण के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मेरठ में अवैध और बिना अनुमति के निर्माणों पर कार्रवाई जारी रखते हुए आदेश दिया है कि शास्त्री नगर योजना क्षेत्र की 859 संपत्तियों में सभी अवैध सेटबैक (निर्माण के चारों ओर अनिवार्य खुला स्थान) को दो महीने के भीतर ध्वस्त किया जाए. इनमें से 43 इमारते ऐसी हैं जिनमें स्कूल, बैंक और अस्पताल जैसी गतिविधियां चल रही हैं. कोर्ट ने शास्त्री नगर योजना क्षेत्र की 859 संपत्तियों में सभी अवैध सेटबैक संपत्तियों को गिराने का आदेश दिया गया है. निर्माण के चारों ओर अनिवार्य खुला स्थान सैटबैक कहलाता है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लगाई यूपी प्रशासन को फटकार भी लगाई है. कोर्ट ने कहा है कि कानून का शासन जनता की मांग के आगे नहीं झुक सकता. ये मामला पूरे देश की आंख खोलने वाला. 

कोर्ट ने यूपी प्रशासन को लगाई फटकार

कोर्ट ने यूपी प्रशासन को फटकार लगाई कि उन्होंने स्कूल, अस्पताल और यहां तक कि राष्ट्रीयकृत बैंक जैसी संस्थाओं को “पूरी तरह अवैध और अनधिकृत” भवनों में संचालित होने की अनुमति दी. सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने स्पष्ट किया कि कानून का शासन जनता की मांग के आगे नहीं झुक सकता. उन्होंने निर्देश दिया कि 859 संपत्तियों में अवैध रूप से कब्जा किए गए सभी सेटबैक को ध्वस्त किया जाए. यह मामला उस अवमानना याचिका से संबंधित है जिसमें कोर्ट मेरठ के शास्त्री नगर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अवैध निर्माणों की जांच कर रही है.

अवैध इमारतों में कई स्कूल और अस्पताल भी

6 अप्रैल 2026) को हुई सुनवाई में कोर्ट ने पूर्व मेरठ संभागीय आयुक्त को फटकार लगाई थी, जिन्होंने कोर्ट के आदेश के बावजूद अवैध निर्माण को रोकने का आदेश दिया था.जानकारी दी गई कि कुल 859 अवैध निर्माण हैं, जिनमें से 44 का उपयोग वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए किया गया.अब कोर्ट को बताया गया कि 44 अवैध रूप से परिवर्तित संपत्तियों में 6 स्कूल, 6 अस्पताल, 4 बैंक्वेट हॉल, 3 राष्ट्रीयकृत बैंक और 1 एनबीएफसी शामिल हैं.पीठ ने विशेष रूप से शिक्षा और चिकित्सा संस्थानों के अवैध भवनों में होने पर चिंता व्यक्त की, कहते हुए कि कि हमारे लिए महत्वपूर्ण है बच्चों और मरीजों की जान.हमें आपके व्यवसाय की चिंता नहीं है.आप किसी की जान के खतरे पर व्यवसाय कर रहे हैं. 

कोर्ट ने पूछा कहां है लाइसेंस

वहीं, जस्टिस पारदीवाला ने पूछा कि इस योजना को किसने मंजूरी दी?इस स्कूल को लगाने की अनुमति किसने दी?जिला शिक्षा अधिकारी की अनुमति कहां है? स्कूल चलाने का लाइसेंस कहां है? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेटबैक का कोई भी कम्पाउंडिंग संभव नहीं है, यानी कोई भी भुगतान या नियमितीकरण अवैध कब्जे को वैध नहीं बना सकता.कोर्ट ने ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया भी स्पष्ट की कि सभी कब्जेदारों को नोटिस जारी किया जाए.उन्हें 10-15 दिन का समय दिया जाए कि वे स्वयं अवैध सेटबैक हटाएं.यदि वे असफल रहते हैं, तो प्राधिकरण उनकी लागत पर ध्वस्त करें और बाद में यह राशि कब्जेदारों से वसूल करें.कोर्ट ने कहा कि जबकि 44 संपत्तियों को तुरंत सील करने की पहचान हुई है, शास्त्री नगर क्षेत्र में लगभग 815 अन्य अवैध संपत्तियां अभी भी हैं.कोर्ट ने निर्देश दिया कि शेष संपत्तियों के निपटान के लिए योजना बनाई जाए.

कोर्ट ने निर्देश दिया कि 44 संपत्तियों की स्थिति का हलफनामा पेश किया जाए, जिसमें प्रत्येक संपत्ति के पहले और बाद की तस्वीरें हों, साथ ही फोटोग्राफ दो भागों में होना चाहिए. ऊपर का भाग सील करने से पहले और नीचे का भाग सील करने के बाद का हो.कोर्ट ने सुनवाई का निष्कर्ष यह कहते हुए निकाला कि यह मामला केवल यूपी के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के राज्य मशीनरी के लिए एक चेतावनी है. अगर अधिकारियों ने समय पर सही दिशा में कदम उठाए होते तो यह स्थिति नहीं उत्पन्न होती.

जस्टिस जे. बी. पारदीवाला ने कहा कि यह एक आई ओपनर है, यह सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं कि पूरे देश के लिए है कि जहां राज्य सरकार अपना काम सही समय पर अपना काम करें तो इस तरह की समस्या नहीं आए ही नहीं.हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हम आपके बिजनेस ( उन जगहों पर अवैध रूप से बने स्कूल अस्पताल और अन्य व्यावसायिक केंद्र) पर नहीं बल्कि हमारा ध्यान उन अवैध जगह पर बने स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों और हॉस्पिटल के मरीजों को लेकर है.

उन्होंने कहा कि कानून का राज को बनाए रखना ज़रूरी है.ऐसे मे इस मामले से आँखें नहीं रहेंगे. मामला अगली बार जुलाई 2026 में सूचीबद्ध है. दरअसल 25 मार्च 2026 को जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की एक अन्य समन्वयित पीठ ने पूरे देश में आवासीय भूमि/भवनों के वाणिज्यिक उपयोग की व्यापक समस्या पर संज्ञान लिया था और सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की राजधानी नगरपालिकाओं को हलफनामा दायर करने के लिए शामिल किया था. 

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