4 मई से 4 जून तक... फिरहाद ने साथ छोड़ा, जहांगीर का इस्तीफा और अभिषेक के पीछे ED! कैसे अर्श से फर्श पर आ गईं ममता बनर्जी?

बीते तीस दिनों की घटनाओं ने ममता बनर्जी को राजनीतिक रूप से बेहद कमजोर कर दिया है, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि उनकी राजनीति पूरी तरह खत्म हो गई है.

Jun 4, 2026 - 20:36
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4 मई से 4 जून तक... फिरहाद ने साथ छोड़ा, जहांगीर का इस्तीफा और अभिषेक के पीछे ED! कैसे अर्श से फर्श पर आ गईं ममता बनर्जी?

4 मई 2026 तक ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की सबसे ताकतवर नेता थीं और सत्ता की कमान उनके हाथ में थी. लेकिन ठीक 30 दिन बाद यानी 4 जून तक आते-आते तस्वीर पूरी तरह पलट चुकी है. विधानसभा चुनाव में करारी हार, खुद की पार्टी के 50 से ज्यादा विधायकों की बगावत, भरोसेमंद मेयर फिरहाद हकीम का इस्तीफा, जमीनी कमांडरों का पीछे हटना और अभिषेक बनर्जी पर केंद्रीय एजेंसियों का शिकंजा. इन सबने मिलकर ममता के राजनीतिक साम्राज्य को अर्श से फर्श पर पहुंचा दिया. यह एक्सप्लेनर उन्हीं चार हफ्तों की पूरी कहानी बताता है कि कैसे घटनाएं एक के बाद एक ऐसी हुईं कि तृणमूल कांग्रेस ताश के पत्तों की तरह बिखर गई...

1. चुनावी हार ने जड़ से हिला दिया

पूरी कहानी की शुरुआत होती है 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों से. तृणमूल कांग्रेस को इन चुनावों में ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा और पार्टी सत्ता से बाहर हो गई. 294 सीटों में से भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत हासिल करते हुए 207 सीटें जीतीं और पहली बार अपने दम पर राज्य में सरकार बनाई. वहीं TMC 80 सीटों पर सिमट गई> कांग्रेस को 2, AIJUP को 2, CPM को 1 और अन्य को 2 सीटें मिलीं. यह सिर्फ हार नहीं थी, बल्कि पार्टी के अंदर जमा सारा गुस्सा और खींचतान अचानक बाहर निकलने लगी. चुनाव परिणाम आने के कुछ ही दिनों के भीतर साफ हो गया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व पर अब पार्टी के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं. जो संगठन कभी उनके इशारों पर चलता था, वही अब उनके खिलाफ बोलने लगा.

2. 50 विधायकों की बगावत और नेता प्रतिपक्ष का बड़ा खेल

हार के तुरंत बाद जो हुआ, उसने तो ममता बनर्जी की मुश्किलें और बढ़ा दीं. पार्टी के 50 से अधिक विधायकों ने खुला विद्रोह कर दिया और अपने को बागी गुट घोषित कर दिया. इन बागी विधायकों ने गंभीर आरोप लगाया कि ममता बनर्जी के वफादार खेमे ने विपक्ष के नेता पद के लिए उनके जाली हस्ताक्षर का इस्तेमाल किया. मामला इतना बढ़ा कि विधानसभा अध्यक्ष तक पहुंचा और स्पीकर ने बागी गुट के नेता रितब्रत बनर्जी को ही आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी. इस एक फैसले ने TMC के विधायक दल में औपचारिक रूप से टूट की मुहर लगा दी. अब ममता के पास न तो सरकार थी, न ही विपक्ष की एकजुट कमान. पार्टी दोफाड़ हो चुकी थी और अधिकतर विधायक उनके खिलाफ जा चुके थे.

3. जमीन पर ‘जहांगीर’ जैसे सिपहसालारों का पीछे हटना

ममता बनर्जी की असली ताकत उनके जमीनी कार्यकर्ताओं और स्थानीय कमांडरों का नेटवर्क रही है. इन्हीं में से एक बड़ा नाम था जहांगीर खान. जहांगीर खान जैसे नेता बूथ लेवल पर पार्टी की रीढ़ माने जाते थे, लेकिन चुनावी हार और अंदरूनी टूट के बाद हालात बदल गए. इनमें से कई कमांडरों ने विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक फैसलों से खुद को अलग करना शुरू कर दिया. एक खास मामले में तो जहांगीर खान के करीबी एक BDO (खंड विकास अधिकारी) का तबादला तक कर दिया गया, जिससे सीधा संकेत गया कि अब प्रशासनिक पकड़ भी खिसक रही है. जब जमीनी कमांडर पीछे हटने लगे तो ममता का जो बुनियादी ढांचा था, वह तेजी से बिखरता चला गया. यह बिखराव बगावत को और हवा देने वाला साबित हुआ.

4. फिरहाद हकीम का इस्तीफा- सबसे भरोसेमंद साथी ने भी छोड़ दिया साथ

ममता बनर्जी के सबसे करीबियों में शुमार फिरहाद (बॉबी) हकीम उन मुट्ठी भर नेताओं में थे जिन पर ममता आंख बंद करके भरोसा करती थीं. कोलकाता नगर निगम का मेयर होने के नाते उनके पास शहर की प्रशासनिक ताकत थी. लेकिन 3 जून 2026 को फिरहाद हकीम ने मेयर पद से इस्तीफा दे दिया. इस्तीफे की वजह साफ थी कि उन्होंने ममता को बताया कि विपक्ष में बैठने के बाद निगम के प्रशासनिक कामकाज को चलाना राजनीतिक और व्यावहारिक दोनों तरह से बेहद मुश्किल हो रहा है. ममता ने खुद उनके इस्तीफे पर सहमति दे दी. इस इस्तीफे ने यह संकेत दे दिया कि अब वही लोग पीछे हट रहे हैं जो कभी ममता के राजनीतिक कवच थे. कोलकाता जैसे बड़े शहरी केंद्र में मेयर का पद जाना यह दिखाने के लिए काफी था कि TMC की शहरी पकड़ भी कमजोर पड़ चुकी है.

5. अभिषेक बनर्जी पर केंद्रीय एजेंसियों का शिकंजा

ममता बनर्जी की राजनीति में उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी को भविष्य का नेता और उत्तराधिकारी माना जाता रहा है. ठीक उसी दौर में जब पार्टी टूट रही थी, तब केंद्रीय एजेंसियों ने कथित शिक्षक भर्ती घोटाले में अभिषेक बनर्जी को समन जारी कर दिया. इस एक कदम ने TMC नेतृत्व के सामने दोहरी मुश्किल खड़ी कर दी. एक तरफ ममता अपनी पार्टी बचाने की लड़ाई लड़ रही थीं, तो दूसरी तरफ उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी पर कानूनी शिकंजा कसता जा रहा था. इससे यह धारणा मजबूत हुई कि ममता बनर्जी का पूरा शीर्ष नेतृत्व अब रक्षात्मक मुद्रा में आ गया है और आने वाले समय में उनकी मुश्किलें और बढ़ सकती हैं.

6. कालीघाट की बैठक और सिर्फ 19 विधायकों का पहुंचना

पार्टी में टूट को रोकने और बचे हुए विधायकों को एकजुट करने के लिए ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास पर एक अहम बैठक बुलाई. लेकिन इस बैठक ने उनकी कमजोरी को और भी उजागर कर दिया. पार्टी के कुल 80 विधायकों में से मात्र 19 से 20 विधायक ही वहां पहुंचे. कोरम पूरा न होने की वजह से बैठक बिना किसी ठोस नतीजे के खत्म हो गई. यह वह पल था जब यह पूरी तरह साफ हो गया कि ममता बनर्जी के हाथ से पार्टी की कमान फिसल चुकी है. विधायकों का भारी बहुमत अब उनके आह्वान पर भी साथ आने को तैयार नहीं था.

क्या ममता बनर्जी की राजनीति खत्म हो गई है?

इन तीस दिनों की घटनाओं ने ममता बनर्जी को राजनीतिक रूप से बेहद कमजोर कर दिया है, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि उनकी राजनीति पूरी तरह खत्म हो गई है. पश्चिम बंगाल में ममता की जमीनी पकड़ और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता का लंबा इतिहास रहा है. हालांकि, फिलहाल उनके सामने चुनौतियां बहुत बड़ी हैं. पार्टी का एक बड़ा हिस्सा उन्हें छोड़ चुका है, शीर्ष नेतृत्व पर कानूनी शिकंजा है और जमीनी संगठन बिखर चुका है. 

सबसे बड़ी चुनौती होगी खुद को और पार्टी को फिर से खड़ा करना, क्योंकि बगावत के बाद बचे हुए वफादारों की संख्या सीमित नजर आती है. ममता बनर्जी ने राजनीति में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन मई-जून 2026 का यह भूचाल उनके करियर का अब तक का सबसे बड़ा झटका है. आने वाले महीने ही बताएंगे कि क्या वह इस बार भी वापसी कर पाती हैं या बंगाल की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है.

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