लगातार सेवा में छोटे-मोटे ब्रेक से एड-हॉक कर्मचारी रेगुलराइजेशन के लिए अयोग्य नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट

Apr 20, 2026 - 17:41
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लगातार सेवा में छोटे-मोटे ब्रेक से एड-हॉक कर्मचारी रेगुलराइजेशन के लिए अयोग्य नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एड-हॉक सेवा में सिर्फ़ छोटे-मोटे ब्रेक से सेवा की निरंतरता पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जिससे कोई कर्मचारी सेवा के रेगुलराइजेशन के फ़ायदे के लिए अयोग्य हो जाए। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें अपील करने वालों को रेगुलराइजेशन देने से मना कर दिया गया था। इन लोगों को 1995-96 में पंजाब सरकार के वित्त विभाग में चपरासी और क्लर्क के तौर पर एड-हॉक आधार पर नियुक्त किया गया। उन्हें रेगुलराइजेशन से सिर्फ़ इस आधार पर मना किया गया कि उनके सर्विस रिकॉर्ड में 5 से 187 दिनों तक के ब्रेक दिख रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट के सामने अपील करने वालों ने दलील दी कि उन्हीं जैसी स्थिति वाले दूसरे कर्मचारियों को, जिनके सर्विस ब्रेक और भी ज़्यादा लंबे थे, रेगुलराइजेशन दे दिया गया। इसलिए उन्हें वही फ़ायदा न देना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है। हालांकि, प्रतिवादी-अथॉरिटी ने यह दलील दी कि चूंकि अपील करने वालों की नियुक्तियां लगातार नहीं थीं, इसलिए एड-हॉक सेवा में उनके ब्रेक उन्हें पॉलिसी के तहत अयोग्य बना देंगे।

अपील करने वालों की दलील में दम पाते हुए जस्टिस मसीह ने अपने फ़ैसले में कहा, "ये ब्रेक सेवा को सचमुच छोड़ने या अपनी मर्ज़ी से नौकरी खत्म करने का संकेत नहीं देते हैं।" कोर्ट ने कहा, "इसलिए हमारी राय है कि अपील करने वालों की लंबी सेवा को सिर्फ़ दिखावटी ब्रेक के आधार पर और उनकी शुरुआती नौकरी को एड-हॉक बताकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।" राज्य चुनिंदा तरीके से काम नहीं कर सकता कोर्ट ने कहा कि जहां एक तरफ़ उन्हीं जैसी स्थिति वाले दूसरे कर्मचारियों को सेवा के रेगुलराइजेशन का फ़ायदा दिया गया था, वहीं अपील करने वालों को भी वही फ़ायदा देने के लिए समानता का मामला बनता है।

अदालत ने टिप्पणी की, “रिकॉर्ड पर यह बात आई कि राज्य सरकार के अलग-अलग विभागों में 26.05.2003 और 15.12.2006 की पॉलिसी से जुड़ी हिदायतों को ध्यान में रखते हुए बड़ी संख्या में ऐसे कर्मचारियों को पक्का (Regularize) किया गया, जिनकी स्थिति मौजूदा अपीलकर्ताओं जैसी ही थी। भले ही उनकी नौकरी में रुकावटें आई थीं, जैसा कि मौजूदा अपीलकर्ताओं के मामले में है। ऐसे 46 एड-हॉक कर्मचारियों का ब्योरा सामने लाया गया, जिन्हें इन पॉलिसियों का फ़ायदा दिया गया। इनकी नौकरी में 64 से लेकर 334 दिनों तक की रुकावटें आई थीं—यानी, अपीलकर्ताओं के मामले में आई रुकावटों से भी ज़्यादा समय की रुकावटें। इस बात पर प्रतिवादियों ने कोई एतराज़ नहीं जताया। इसलिए समानता का एक मामला बनता है, क्योंकि अपीलकर्ताओं की नौकरी के रिकॉर्ड में सिर्फ़ 5 से लेकर 187 दिनों तक की ही रुकावटें आई हैं। राज्य सरकार, अपीलकर्ताओं पर इस पॉलिसी को लागू करने से चुनिंदा तरीके से इनकार नहीं कर सकती—जबकि अपीलकर्ता भी उन्हीं लोगों जैसी ही स्थिति में हैं—और ऐसा करने के लिए उनके पास कोई ठोस वजह भी नहीं है।”

ऊपर कही गई बातों के आधार पर अपील मंज़ूर की गई और अपीलकर्ताओं की सेवाओं को पक्का करने का निर्देश दिया गया। अदालत ने आदेश दिया, “प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाता है कि वे इस आदेश की कॉपी मिलने की तारीख से चार (4) हफ़्तों के अंदर अपीलकर्ताओं की सेवाओं को पक्का करने का आदेश जारी करें। उनकी तनख्वाह और भत्ते, पक्का होने की शुरुआती तारीख से ही तय किए जाएंगे। अपीलकर्ता एक पक्के कर्मचारी के तौर पर नौकरी में लगातार बने रहने के साथ-साथ उससे जुड़े सभी फ़ायदों—जिनमें इंक्रीमेंट और दूसरे फ़ायदे शामिल हैं—के हकदार होंगे। सिवाय अब तक मिले असल आर्थिक फ़ायदों के।”

Cause Title: PREM CHAND AND OTHERS VERSUS STATE OF PUNJAB AND ANOTHER

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