पत्नी के करियर बनाने की कोशिश में पति की भावनाएं आहत होना क्रूरता नहीं', सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि पत्नी का अपने करियर में आगे बढ़ने की कोशिशों को 'वैवाहिक क्रूरता' नहीं मान सकते। सर्वोच्च अदालत ने ऐसी सोच को 21वीं शताब्दी में भी महिलाओं को पति की सहमति तक सीमित करने वाली पिछड़ी मानसिकता बताया।

May 13, 2026 - 15:37
 0  21
पत्नी के करियर बनाने की कोशिश में पति की भावनाएं आहत होना क्रूरता नहीं', सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी

सुप्रीम कर्ट  ने महिलाओं के करियर और विवाह को लेकर अधिकारों के मामले पर एक अहम टिप्पणी की है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि पत्नी के अपने पेशेवर सपनों को पूरा करने के प्रयास को वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकते। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ इसलिए किसी महिला के करियर को गलत करार देना कि उससे पति या उसके ससुराल वालों की भावनाएं आहत हो सकती हैं, यह बेहद पिछड़ी सोच को दिखाता है।

महिला के करियर में आगे बढ़ने को 'क्रूरता' मानना चिंताजनक

लाइव लॉ डॉट इन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस Vikram Nath और जस्टिस Sandeep Mehta की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब देश आज महिला सशक्तिकरण की बातें कर रहा है, तब किसी महिला की प्रोफेशनल पहचान को पति की मंजूरी मिलने पर निर्भर मानना संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 21वीं सदी में भी यदि किसी काबिल महिला के करियर आगे बढ़ाने के निर्णय को 'क्रूरता' माना जाए, तो यह काफी चिंताजनक है।

बेटी के बेहतर इलाज के लिए कारगिल से लौटी थी महिला

जान लें कि यह केस एक महिला डेंटिस्ट का था, जिनकी शादी एक आर्मी अफसर से 2009 में हुई थी। पति की पोस्टिंग कारगिल में होने के चलते महिला पहले वहां चली गई थी, लेकिन बेटी की सेहत बिगड़ने के बाद बेहतर इलाज के लिए वह अहमदाबाद लौट आईं और मायके में रहने लगीं। इसके बाद, यहीं महिला ने फिर से अपना डेंटल करियर शुरू किया।

निचली अदालतों के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई हैरानी

हालांकि, फैमिली कोर्ट ने अपने फैसले में अहमदाबाद में क्लिनिक खोलने और मायके में रहने को वैवाहिक क्रूरता और पति का परित्याग माना था। हाईकोर्ट ने भी बाद में इस निर्णय को सही ठहराया था। हालांकि, Supreme Court ने निचली अदालतों के इन निर्णयों को 'चौंकाने वाला' और 'पूरी तरह अस्वीकार्य' माना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्नी से यह आशा करना कि पति की जॉब और सुविधा के लिए वह अपने सपनों का बलिदान दे देगी, यह आज के समाज और संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है।

साभार