फैसलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: हाईकोर्ट को 3 महीने में फैसला सुनाने का निर्देश, बेल मामलों पर ‘तुरंत आदेश’ की गाइडलाइन हुई जारी
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को आरक्षित फैसले 3 महीने में सुनाने का निर्देश दिया है. साथ ही बेल मामलों में तुरंत फैसले और जेल से रिहाई सुनिश्चित करने की गाइडलाइन भी जारी की गई है, ताकि न्याय प्रक्रिया में देरी पर रोक लग सके.
नई दिल्ली: देशभर में अदालतों में फैसलों में हो रही देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि हाईकोर्ट में आरक्षित (Reserved) फैसले सामान्यतः तीन महीने के भीतर सुनाए जाएं. साथ ही बेल मामलों, अंडरट्रायल कैदियों और फैसलों के अपलोड में देरी रोकने के लिए विस्तृत गाइडलाइन भी जारी की गई है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच (न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और विपिन एम पंचोली) ने ये निर्देश जारी किए. मामला झारखंड हाईकोर्ट के एक फैसले के अपलोड में देरी से जुड़ा था, जिसमें दिसंबर 2025 में फैसला सुनाया गया था, लेकिन उसे वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया था और वकीलों को भी उपलब्ध नहीं कराया गया.
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साफ कहा, 'न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के बराबर है. फैसलों में देरी अब बर्दाश्त नहीं होगी.' साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये निर्देश किसी जज या अदालत पर टिप्पणी नहीं हैं, बल्कि सिस्टम को सुधारने के लिए हैं.
SC की निचली अदालतों को खास हिदायत
SC ने स्पष्ट कहा कि फैसलों की समय सीमा तय हो. साथ ही आरक्षित फैसले तीन महीने के भीतर सुनाना अनिवार्य होगा. देरी होने पर रजिस्ट्रार जनरल मामला चीफ जस्टिस के सामने रखेंगे, जरूरत पड़ी तो 2 हफ्ते की अतिरिक्त मोहलत दी जाएगी. इसके बाद भी देरी हुई तो मामला दूसरी बेंच को ट्रांसफर कर दिया जाएगा.
बेल मामलों पर खास निर्देश
SC ने साफ निर्देश देते हुए कहा, बेल आवेदन पर उसी दिन या अगले दिन फैसला देना होगा. बेल आदेश उसी दिन जेल प्रशासन को भेजना भी अनिवार्य होगा. इसके अलावा अंडरट्रायल कैदी को उसी दिन या अगले दिन रिहा करना होगा.
फैसलों के अपलोड पर भी गाइडलाइन जारी
SC का कहना है कि कोर्ट में सिर्फ ऑपरेटिव हिस्सा पढ़ा जा सकता है. लेकिन डिटेल आदेश 7 दिन में अपलोड करना जरूरी है. अगर यह 15 दिन तक अपलोड नहीं हुआ तो पक्षकार आवेदन दे सकते हैं. 30 दिन बाद भी कारण नहीं मिले तो केस दूसरी बेंच में भेजने की मांग भी कर सकते हैं.
पारदर्शिता के लिए तकनीकी सुधार
साथ ही SC ने यह भी साफ कह दिया है कि हाईकोर्ट वेबसाइट पर दिखाना होगा कि फैसला कब रिजर्व हुआ. चीफ जस्टिस को वेबसाइट सिस्टम में बदलाव करने का निर्देश दिया गया है.
इसके अलावा ट्रायल कोर्ट को हाईकोर्ट को यह बताना होगा कि आदेशों का पालन हुआ या नहीं. बता दें कि सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया गया है कि चीफ जस्टिस के सामने गाइडलाइन रखें
व्यक्तिगत स्वतंत्रता वाले मामलों पर खास जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) जुड़ी हो, उनमें फैसले और भी तेजी से दिए जाने चाहिए.
CJI सूर्यकांत ने साझा किया अनुभव
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा, 'हाईकोर्ट जज के रूप में 15 साल के कार्यकाल में हमने कभी भी कोई फैसला तीन महीने से ज्यादा लंबित नहीं रखा.'
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही झारखंड हाईकोर्ट को निर्देश दे चुका था कि संबंधित फैसला एक सप्ताह के भीतर उपलब्ध कराया जाए.
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