मुखिया की मृत्यु के बाद संपत्ति के साथ साथ क्या कर्ज का भी होता है बंटवारा, जानिए क्या कहता है कानून?

परिवार के मुखिया की मृत्यु के बाद संपत्ति का बंटवारा होता है, लेकिन कर्ज का व्यक्तिगत हस्तांतरण नहीं होता है. बैंक केवल मृतक की संपत्ति से ही लोन की वसूली कर सकते हैं.

Jul 22, 2026 - 16:57
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मुखिया की मृत्यु के बाद संपत्ति के साथ साथ क्या कर्ज का भी होता है बंटवारा, जानिए क्या कहता है कानून?

परिवार के मुखिया के गुजर जाने के बाद अक्सर उनके द्वारा छोड़े गए धन, मकान और जमीन के बंटवारे पर चर्चा शुरू हो जाती है. लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि मृतक के सिर पर मौजूद कर्ज का क्या होगा. आम लोगों में अक्सर गलतफहमी रहती है कि विरासत में मिली संपत्ति की तरह उधारी और लोन भी उत्तराधिकारियों में बंट जाते हैं. भारतीय कानून इस मामले में बेहद स्पष्ट और व्यावहारिक रूख अपनाता है. नियम कहता है कि लोन की जिम्मेदारी सीधे तौर पर किसी वारिस पर थोपी नहीं जा सकती है, बल्कि इसकी भरपाई के कानूनी तरीके हैं.

स्व-अर्जित संपत्ति पर वारिसों का अधिकार

माता या पिता की मौत के बाद उनकी अपनी कमाई से हासिल की गई संपत्ति का कानूनी रूप से सही बंटवारा किया जाता है. हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत यह संपत्ति प्रथम श्रेणी के कानूनी वारिसों, जैसे पत्नी, बच्चों और मां में बराबर बांटी जाती है. हालांकि संपत्ति हस्तांतरित होने से सभी देनदारियों और उधारी की गणना करना अनिवार्य होता है. कानून का मूल सिद्धांत यह कहता है कि पहले मृतक की संपत्ति से उनके देनदारों का हिसाब चुकता किया जाए, उसके बाद भी बची हुई संपत्तियों का आपस में बंटवारा हो सकता है.

असुरक्षित लोन या निजी संपत्ति की सुरक्षा

क्रेडिट कार्ड या पर्सनल लोन जैसे असुरक्षित कर्जों के मामले में लेनदार या फिर बैंक सीधे तौर पर मृतक की छोड़ी गई संपत्ति से अपनी राशि वसूलने का प्रयास करते हैं. अगर मृतक की कुल संपत्ति बेचे जाने के बाद भी पूरा कर्ज नहीं चुका पाता है तो बैंक बाकी बचे पैसे के लिए वारिसों पर दबाव नहीं बना सकता है. कानून वारिसों की निजी संपत्ति की पूरी सुरक्षा करता है. इसका सीधा मतलब यह है कि बच्चों के रिश्तेदारों को अपनी जेब से या अपनी संपत्ति बेचकर मृतक का बकाया लोन चुकाने के लिए कानूनी रूप से मजबूर नहीं किया जा सकता है.

सुरक्षित कर्ज और संपत्ति जब्ती का नियम

होम लोन या कार लोन जैसे सुरक्षित कर्जों का मामला असुरक्षित लोन से थोड़ा अलग होता है. ऐसे मामलों में बैंक के पास उस संपत्ति का अधिकार गिरवी के तौर पर होता है. यदि मुखिया की मौत के बाद किश्तें जमा नहीं की जाती हैं तो बैंक उस विशेष संपत्ति को नीलाम करके अपना पैसा वसूल सकता है. हालांकि अगर उत्तराधिकारी उस मकान या कार को अपने पास ही रखना चाहे तो उनको खुद पूरा लोन चुकाना होगा या फिर किश्तों का नियमित भुगतान जारी रखना होगा.

सह आवेदक और गारंटर की कानूनी देनदारी

कर्ज वसूली के नियमों में एक महत्पपूर्ण अपवाद सह-आवेदक या गारंटर की भूमिका होती है. अगर मुखिया के जीवित रहते परिवार के किसी सदस्य ने लोन लेते समय खुद को गारंटर या फिर सह-आवेदक के रूप में नामांकित किया था, तो वह कानूनी रूप से जिम्मेदारी से बच नहीं सकता है. 

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