आरक्षण को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू का क्या था स्टैंड?
बीते दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस और पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर निशाना साधते हुए कहा था कि सच्चाई यह है कि अगर अंबेडकर नहीं होते तो नेहरू एससी/एसटी के लिए आरक्षण की अनुमति नहीं दी होती. एक नजर डालते हैं कि आरक्षण को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की क्या राय थी.
लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बयानों का दौर जारी है. आरक्षण के मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी एक दूसरे पर हमलावर है. हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा था कि अगर अंबेडकर नहीं होते तो नेहरू अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की अनुमति नहीं दी होती. पीएम मोदी ने कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन पर यह भी आरोप लगाया कि I.N.D.I.A गठबंधन संविधान बदलना चाहता है और धर्म के आधार पर आरक्षण देना चाहता है.
आइए एक नजर डालते हैं कि आरक्षण को लेकर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू क्या सोचते थे और उनका क्या स्टैंड था. आरक्षण को संवैधानिक दर्जा देने को लेकर संविधान सभा की बहस में क्या-क्या हुआ था.
आरक्षण का प्रारंभिक प्रावधान क्या था?
देश में जब पहली बार संविधान लागू हुआ. उसी वक्त संविधान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए राजनीतिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने का प्रावधान शामिल किया गया. 30 नवंबर 1948 को जब पहली बार आरक्षण को लेकर संविधान सभा में बहस हुई उस वक्त इसे 'मसौदा अनुच्छेद 10' के रूप में जाना जाता था. वर्तमान में अनुच्छेद 16 के तहत किसी भी पिछड़े वर्ग के लिए जिनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है उनके लिए राज्य सेवाओं में नियुक्तियां आरक्षित करने की अनुमति दी गई है.
संविधान सभा में बहस के दौरान 'पिछड़ा वर्ग' टर्म को लेकर काफी विवाद हुआ था. क्योंकि संविधान सभा के कई सदस्यों का मानना था कि यह टर्म बहुत ही अस्पष्ट है क्योंकि इस टर्म को संविधान में कहीं और परिभाषित नहीं किया गया है.
आरक्षण को लेकर संविधान सभा के सदस्यों के क्या विचार थे?
देश के पहले दलित वकीलों में से एक कांग्रेस के चंद्रिका राम और धर्म प्रकाश ने 'पिछड़े वर्ग' टर्म की जगह पर अनुसूचित जाति या कोई और शब्दों के इस्तेमाल करने की वकालत की. ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किस समूह के लोग आरक्षण का लाभ उठा सकते हैं.
दूसरी ओर कांग्रेस के ही लोकनाथ मिश्रा और दामोदर स्वरूप सेठ जैसे सदस्यों ने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण देने के प्रावधान को हटाने की मांग की थी. मिश्रा ने संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि हर किसी को रोजगार, भोजन, कपड़े और आश्रय का अधिकार है. किसी भी नागरिक द्वारा रोजगार के एक हिस्से पर दावा करना का मौलिक अधिकार नहीं है. यह सिर्फ योग्यता के आधार पर तय होना चाहिए. यह कभी भी मौलिक अधिकार नहीं हो सकता है.
आरक्षण को लेकर अंबेडकर की क्या राय थी?
'पिछड़ा' शब्द पर बहस को संबोधित करते हुए अंबेडकर ने कहा था कि यह एक 'सामान्य सिद्धांत' है. हालांकि, सरकारी नौकरी के मामले में सभी नागरिकों को समान अवसर मिले इसको लेकर उन्होंने तर्क दिया कि 'पिछड़ा' शब्द यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि उत्पीड़ित समुदायों को प्रदान किए जा रहे आरक्षण का अपवाद ना हो और यह पूरी तरह से अवसर की समानता का अधिकार खत्म ना कर दे. पिछड़ा शब्द को लेकर उन्होंने कहा था कि इसका निर्धारण प्रत्येक स्थानीय या राज्य सरकार करेगी.
आरक्षण पर नेहरू का क्या स्टैंड था?
आरक्षण से संबंधित अनुच्छेदों पर संविधान सभा में हुए बहस में पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू ने कोई योगदान नहीं दिया था. बाद में यानी प्रधानमंत्री बनने के बाद जून 1961 में नेहरू ने देश के मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने पिछड़ों को मजबूत बनाने की आवश्यकताओं पर जोर दिया था. नेहरू का मानना था कि पिछड़ों को अच्छी शिक्षा देकर मजबूत किया जाए ना कि जाति और पंथ के आधार पर नौकरियों को आरक्षित करके.
मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में पूर्व पीएम नेहरू ने लिखा था, " यह सच है कि हम एससी और एसटी की मदद के बारे में कुछ नियमें और परंपराओं से बंधे हैं. वे मदद के हकदार हैं. लेकिन मैं किसी भी प्रकार के आरक्षण को पसंद नहीं करता हूं. खासकर किसी भी तरह की सेवाओं (नौकरियों) में. पिछड़े लोगों को मदद करने का एकमात्र उचित तरीका अच्छी शिक्षा का अवसर प्रदान करना है. इसमें तकनीकी शिक्षा भी शामिल है जो लगाता महत्वपूर्ण होती जा रही है. इसके अलावा अन्य किसी भी तरह की मदद का प्रावधान बैसाखी का प्रावधान की तरह है. यह शरीर की ताकत या स्वास्थ्य को बेहतर नहीं करता है.
नेहरू ने आगे लिखा था कि सांप्रदायिक और जातिगत आधारित आरक्षण प्रतिभाशाली और सक्षम लोगों को बर्बाद कर देता है जबकि समाज दोयम दर्जे या तीसरे दर्जे का ही बना रहता है. मुझे यह जानकर दुख हुआ कि सांप्रदायिक विचार के आधार पर आरक्षण का मामला कितना आगे बढ़ गया है.
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