क्या इस्तीफा देने वाले RS सांसदों को भी मिलती है पेंशन, कितनी होती है रकम?

राज्यसभा से इस्तीफा देने वाले सांसदों को भी पेंशन मिल सकती है, बशर्ते उन्होंने कम से कम पांच साल का कार्यकाल पूरा किया हो. आइए जानें कि उनके लिए और क्या नियम हैं और कितनी पेंशन मिलती है.

Oct 14, 2026 - 15:32
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क्या इस्तीफा देने वाले RS सांसदों को भी मिलती है पेंशन, कितनी होती है रकम?

संसद की राजनीति में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब बड़े नेता अपने पद और सदन की सदस्यता से अचानक इस्तीफा दे देते हैं. हाल ही में केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन द्वारा राज्यसभा की सदस्यता छोड़ने के ऐलान के बाद एक बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि क्या बीच में ही इस्तीफा देने वाले सांसदों को भी पेंशन का लाभ मिलता है या नहीं. आज हम आपको संसद के उन खास नियमों के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं जो पूर्व सांसदों की पेंशन और अन्य वित्तीय सुविधाओं से जुड़े हुए हैं.

क्या बीच में इस्तीफा देने पर मिलती है पेंशन?

देश के मौजूदा कानूनी प्रावधानों के मुताबिक, यदि कोई सांसद अपना पूरा कार्यकाल खत्म होने से पहले ही इस्तीफा दे देता है, तब भी उसे पेंशन मिल सकती है. हालांकि, इसके लिए सबसे अहम शर्त यह होती है कि उस सांसद ने संसद सदस्य के रूप में न्यूनतम आवश्यक कार्यकाल यानी कम से कम पांच साल की सेवा पूरी कर ली हो. अगर किसी जनप्रतिनिधि ने पांच साल का तय सफर पूरा करने के बाद इस्तीफा दिया है, तो वह पेंशन पाने का पूरा हकदार बनता है.

न्यूनतम पेंशन और बेसिक राशि का नियम

संसदीय नियमों के अनुसार, भारत में संसद के किसी भी पूर्व सदन के सदस्य (चाहे वे लोकसभा के रहे हों या राज्यसभा के) को मिलने वाली न्यूनतम पेंशन तयशुदा होती है. वर्तमान नियमों और व्यवस्थाओं के तहत देश के हर पात्र पूर्व सांसद को हर महीने कम से कम 31,000 रुपये की बेसिक पेंशन दी जाती है. यह राशि उन सभी पूर्व सदस्यों को मिलती है जिन्होंने संसद में अपने जरूरी पांच साल सफलतापूक पूरे किए होते हैं.

पांच साल से अधिक कार्यकाल पर अतिरिक्त लाभ

यदि कोई सांसद पांच साल की न्यूनतम अवधि से भी ज्यादा लंबे समय तक उच्च सदन या निचले सदन का सदस्य रहा है, तो उसे सरकार की तरफ से खास वित्तीय फायदा दिया जाता है. नियम यह कहते हैं कि पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद यदि कोई अतिरिक्त वर्ष जुड़ता है, तो हर साल के हिसाब से मासिक पेंशन में ढाई हजार रुपये की अतिरिक्त बढ़ोतरी की जाती है. इसके अलावा, यदि किसी वर्ष में नौ महीने या उससे ज्यादा का कार्यकाल हुआ हो, तो उसे पूरे एक साल के बराबर ही मान लिया जाता है.

कार्यकाल पूरा न होने पर क्या होती है स्थिति?

यदि कोई सांसद अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही अचानक इस्तीफा दे देता है, तो स्थिति थोड़ी अलग हो जाती है. सरकारी और विधायी नियमों के अनुसार, यदि न्यूनतम पांच साल की सेवा पूरी नहीं हुई है और बीच में ही पद छोड़ दिया गया है, तो सांसद उस तयशुदा न्यूनतम पेंशन के दायरे से बाहर हो सकते हैं. यानी पेंशन पाने के लिए संसद में एक निश्चित समय बिताना कानूनी रूप से बेहद अनिवार्य माना गया है.

पेंशन के अलावा मिलने वाली अन्य सुख-सुविधाएं

पूर्व सांसदों को केवल हर महीने की तय पेंशन ही नहीं मिलती, बल्कि सरकार की तरफ से उन्हें कई अन्य तरह की बड़ी सहूलियतें भी दी जाती हैं. इनमें पूर्व सांसदों और उनके एक साथी के लिए देश भर में ट्रेन की मुफ्त यात्रा (फर्स्ट एसी या सेकंड एसी में) जैसी बेहतरीन सुविधाएं शामिल हैं. इसके साथ ही, सेहत का ख्याल रखते हुए उन्हें केंद्र सरकार की स्वास्थ्य योजना यानी सीजीएचएस के अंतर्गत मुफ्त चिकित्सा उपचार की सुविधा भी आजीवन प्रदान की जाती है.

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