मनमाना, उल्लंघन, रिश्वत... इलेक्शन से पहले चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट की ये बातें सरकार को चुभेंगी!

चुनावी बॉन्ड स्कीम पर सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है. कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया. कांग्रेस ने चंदादाता को विशेषाधिकार और अन्नदाता से अन्याय का आरोप लगाते हुए बीजेपी सरकार पर हमला बोला है. चुनाव से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट का इलेक्टोरल बांड को रद्द करना प्रचार में मुद्दा बन सकता है.

Feb 15, 2024 - 17:07
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मनमाना, उल्लंघन, रिश्वत... इलेक्शन से पहले चुनावी बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट की ये बातें सरकार को चुभेंगी!

सरकार का फैसला मनमाना और गलत... वोटर के जानने के अधिकार का हनन... फंडिंग को गोपनीय रखना ठीक नहीं... चंदा रिश्वत का जरिया भी... लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट से इलेक्टोरल बॉन्ड पर आया फैसला सरकार को चुभ सकता है. जी हां, इस मामले को लेकर विपक्षी दलों के नेता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. विपक्ष सवाल उठा रहा था कि इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए ज्यादातर चंदा सत्ताधारी दल को ही क्यों मिलता है? याचिकाकर्ताओं ने इसके जरिए 'सत्ताधारी पार्टी को घूस देने' की दलील दी. आज सुप्रीम कोर्ट ने भी वही बात दोहराई. कोर्ट ने साफ कहा, 'इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह चंदा रिश्वत का जरिया भी बन सकता है जिससे सरकारी नीतियां प्रभावित हों.' अब कांग्रेस समेत दूसरी पार्टियां इसे चुनाव में मुद्दा बना सकती हैं. 

सारी जानकारी चुनाव से पहले 

चुनाव की घोषणा होने में करीब एक महीने या थोड़ा ज्यादा समय है. इससे पहले चुनावी बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक करार देते हुए देश की सबसे बड़ी अदालत ने पूरी जानकारी ओपन करने का आदेश सुनाया है. इसमें तारीख अहम है. SBI को खुलासा करना होगा कि किस राजनीतिक पार्टी को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए कितना चंदा मिला है. SBI ये जानकारियां चुनाव आयोग को देगा. चुनाव आयोग 31 मार्च तक इस जानकारी को वेबसाइट पर सार्वजनिक कर देगा. यानी जब लोकसभा चुनाव के लिए देश में प्रचार तेज हो रहा होगा, बॉन्ड के जरिए चंदे की सारी A, B, C, D पता चल चुकी होगी. 

तीन लाइन में फैसले की पूरी बात

पहला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कॉरपोरेट कंपनियों के जरिए मिले चंदे को छिपाया नहीं जाना चाहिए. साथ ही कोर्ट ने कॉरपोरेट कंपनी पर चुनावी बॉन्ड के जरिए चंदा देने की निर्धारित सीमा हटाने के सरकार के फैसले को मनमाना और गलत करार दिया. इलेक्ट्रोल बॉन्ड स्कीम वोटर के जानने के अधिकार का हनन करती है. ये स्कीम वोटरों के आर्टिकल 19 (1) A का उल्लंघन करती है. 

दूसरा: कोर्ट ने दो टूक कहा कि इस स्कीम के जरिए ब्लैक मनी पर लगाम कसने की दलील देकर पार्टियों की फंडिंग के बारे में वोटरों को जानने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. कोर्ट में सरकार ने ही ब्लैक मनी वाली दलील दी थी. 

तीसरा: सरकार ने दानकर्ता के हितों की सुरक्षा और दुरुपयोग की आशंका की दलील रखी थी. कोर्ट ने साफ कहा कि यह कहकर फंडिंग को पूरी तरह से गोपनीय रखना ठीक नहीं है. आखिर में SC ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम के लिए किए गए संशोधन को असंवैधानिक करार दिया और तुरंत रोक लगाने का आदेश दे दिया. 

कांग्रेस का 'नोट-वोट' अटैक

सुप्रीम कोर्ट के चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द करने पर कांग्रेस ने कहा है कि लंबे इंतजार के बाद फैसला बेहद स्वागत योग्य है. यह नोट के मुकाबले वोट की स्थिति मजबूत करेगा. चुनावी बॉन्ड स्कीम को सरकार ने दो जनवरी 2018 को अधिसूचित किया था. तब राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता लाने की पहल बताया गया था. इसमें प्रावधान था कि चुनावी बॉन्ड भारत के किसी भी नागरिक या देश की कंपनी द्वारा खरीदा जा सकता था. कोई भी व्यक्ति अकेले या दूसरे व्यक्तियों के साथ संयुक्त रूप से चुनावी बॉन्ड खरीद सकता था. 

'1% मुनाफा और चंदा 1 करोड़'

वैसे, सुनवाई के समय ही सुप्रीम कोर्ट ने स्कीम पर गंभीर सवाल उठाए थे. कोर्ट ने कहा था कि इसके चलते विपक्षी दलों को पता ही नहीं चल पाएगा कि कौन सत्तारूढ़ पार्टी को चंदा दे रहा है, पर सत्तारूढ़ पार्टी अपनी जांच एजेंसियों के जरिए ये पता करा सकती है कि कौन उन्हें या विपक्षी पार्टियों को चंदा दे रहा है.

कोर्ट ने कॉरपोरेट कंपनी पर चुनावी बॉन्ड के जरिए चंदा देने की निर्धारित सीमा को हटाने पर भी सवाल किया था. दरअसल, पहले वाली व्यवस्था के मुताबिक कोई भी कंपनी पिछले 3 साल के शुद्ध मुनाफे के सालाना औसत का 7.5% से ज्यादा चंदा राजनीतिक पार्टियों को नहीं दे सकती थी, लेकिन इलेक्टोरल बॉन्ड के लिए इस बाध्यता को खत्म कर दिया गया था. 

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा था कि कंपनियों के चंदे को सीमित करने की वजह सही थी. कंपनी होने के नाते आपका काम बिजनस करना है, चंदा देना नहीं और इसके बावजूद आप चंदा देना चाहते हैं तो ये छोटा ही होना चाहिए, लेकिन अब 1% मुनाफा कमा कर रही कंपनी भी एक करोड़ चंदा दे सकती है.

आज सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में साफ कहा कि राजनीतिक दल चुनावी प्रक्रिया में प्रासंगिक इकाइयां हैं और चुनावी विकल्पों के लिए राजनीतिक दलों की फंडिंग के बारे में जानकारी आवश्यक है. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि बैंक तत्काल चुनावी बॉन्ड जारी करना बंद कर दें.

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