सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (11 अगस्त, 2025 से 15 अगस्त, 2025 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
ओलंपियन पहलवान सुशील कुमार की ज़मानत रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत के विरुद्ध अपीलों से संबंधित सिद्धांतों का सारांश प्रस्तुत किया
बुधवार (13 अगस्त) को सागर धनखड़ हत्याकांड में ओलंपियन पहलवान सुशील कुमार की ज़मानत रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत के विरुद्ध अपील के संबंध में सिद्धांत निर्धारित किए। न्यायालय ने कहा कि ज़मानत के विरुद्ध अपील और ज़मानत रद्द करने की अपील अलग-अलग अवधारणाएं हैं, क्योंकि दोनों में अलग-अलग मानदंड शामिल है।
न्यायालय ने कहा कि ज़मानत के विरुद्ध अपील पर हाईकोर्ट विचार कर सकता है, यदि यह दर्शाया गया हो कि ज़मानत आदेश अपराध की गंभीरता, अपराध के प्रभाव, आदेश का अवैध होना, विकृत होना, गवाहों को प्रभावित करने की संभावना आदि जैसे प्रासंगिक कारकों पर विचार किए बिना पारित किया गया था। हालांकि, ज़मानत रद्द करने के लिए आवेदन करते समय इन्हीं आधारों का हवाला नहीं दिया जा सकता, क्योंकि ज़मानत रद्द करने के लिए परिस्थितियों या उस व्यक्ति पर लगाई गई ज़मानत की शर्तों के किसी भी उल्लंघन, जैसे कि ज़मानत दिए जाने के बाद अभियुक्त का आचरण, को ज़मानत आदेश के विरुद्ध अपील में नहीं, बल्कि ज़मानत रद्द करने के आवेदन में दिया जाना चाहिए।
Case : ASHOK DHANKAD Versus STATE NCT OF DELHI AND ANR | SLP(Crl) No. 5370/2025
न्यायिक अधिकारी के रूप में अनुभव को सिविल जज परीक्षाओं के लिए 'तीन साल की प्रैक्टिस' में नहीं गिना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल की प्रैक्टिस नियम पर अपने पहले के आदेश में संशोधन करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार किया। उक्त आदेश में कहा गया था कि न्यायिक अधिकारी के अनुभव को एक प्रैक्टिसिंग वकील के समकक्ष माना जाए। कोर्ट ने कहा कि इससे भानुमती का पिटारा खुल जाएगा।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की खंडपीठ हाल ही में आए उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें न्यायिक सेवा में प्रवेश स्तर के पदों के लिए आवेदन करने हेतु उम्मीदवार के लिए वकील के रूप में न्यूनतम तीन साल की प्रैक्टिस अनिवार्य की गई।
Case Details : MA in ALL INDIA JUDGES ASSOCIATION AND ORS. Versus UNION OF INDIA AND ORS|W.P.(C) No. 1022/1989
वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों की सूची प्रकाशित करें, नाम हटाने का कारण भी बताएं: सुप्रीम कोर्ट का ECI को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (14 अगस्त) को भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्देश दिया कि वह बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के बाद प्रकाशित वोटर लिस्ट से हटाए गए लगभग 65 लाख मतदाताओं की जिलावार सूची जिला निर्वाचन अधिकारियों की वेबसाइटों पर प्रकाशित करे। न्यायालय ने यह भी कहा कि नाम हटाने के कारण जैसे मृत्यु, प्रवास, दोहरा पंजीकरण आदि, स्पष्ट किए जाने चाहिए। यह जानकारी बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर भी प्रदर्शित की जानी चाहिए। दस्तावेजों को EPIC नंबरों के आधार पर सर्च किया जा सके।
Case Title: ASSOCIATION FOR DEMOCRATIC REFORMS AND ORS. Versus ELECTION COMMISSION OF INDIA, W.P.(C) No. 640/2025 (and connected cases)
मध्यस्थता कार्यवाही में हस्ताक्षर न करने वालों को भाग लेने का कोई अधिकार नहीं, उनकी उपस्थिति गोपनीयता का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (13 अगस्त) को कहा कि मध्यस्थता समझौते पर हस्ताक्षर न करने वाला पक्ष मध्यस्थता कार्यवाही में भाग नहीं ले सकता, क्योंकि मध्यस्थता समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले पक्ष केवल मध्यस्थता कार्यवाही में उपस्थित रहने के हकदार हैं। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया, जिसमें मध्यस्थता समझौते पर हस्ताक्षर न करने वालों को अपने वकीलों की उपस्थिति में मध्यस्थता कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति दी गई थी।
Cause Title: KAMAL GUPTA & ANR. VERSUS M/S L.R. BUILDERS PVT. LTD & ANR. ETC. (and connected matter)
निश्चित अवधि के आजीवन कारावास की सजा पूरी करने वाला दोषी बिना छूट के रिहाई का हकदार: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (12 अगस्त) को कहा कि बिना छूट के निश्चित अवधि के आजीवन कारावास की सजा पाने वाला दोषी बिना छूट के स्वतः रिहाई का हकदार है। यह कहते हुए जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह देखते हुए 2002 के नीतीश कटारा हत्याकांड के एक दोषी सुखदेव यादव को रिहा करने का आदेश दिया कि उसने बिना छूट के 20 साल की कारावास की निर्धारित अवधि पूरी कर ली है। न्यायालय ने कहा कि एक बार दोषी द्वारा सजा पूरी कर लेने के बाद सजा समीक्षा बोर्ड के समक्ष छूट के लिए आवेदन करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह न्यायिक सजा पूरी करने के बाद दोषी की रिहाई से इनकार नहीं कर सकता।
Cause Title: SUKHDEV YADAV @ PEHALWAN VERSUS STATE OF (NCT OF DELHI) & OTHERS
वादी आदेश 39 नियम 3 सीपीसी की शर्तों का पालन करने में विफल रहता है तो एकपक्षीय निषेधाज्ञा रद्द की जानी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आदेश 39 नियम 3 सीपीसी के तहत दी गई एकपक्षीय अंतरिम निषेधाज्ञा रद्द की जा सकती है, यदि एकपक्षीय राहत प्रदान करने के कारणों को दर्ज करने और प्रतिपक्षी को दस्तावेज़ों की तामील करने की अनिवार्य आवश्यकताओं का पालन नहीं किया गया हो। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ ने एक ऐसे मामले की सुनवाई की, जिसमें एकपक्षीय अंतरिम निषेधाज्ञा प्राप्त करने वाले अपीलकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें निचली अदालत के आदेश को पलट दिया गया। हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत निषेधाज्ञा प्रदान करने के कारणों को दर्ज करने में विफल रही थी। वादी ने प्रतिवादी को संबंधित दस्तावेज़ों की सुपुर्दगी सुनिश्चित नहीं की थी।
Cause Title: TIME CITY INFRASTRUCTURE AND HOUSING LIMITED LUCKNOW VERSUS THE STATE OF U.P. & ORS.
हाईकोर्ट जज सुप्रीम कोर्ट जजों से कमतर नहीं, सुप्रीम कोर्ट का हाईकोर्ट पर प्रशासनिक नियंत्रण नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हाईकोर्ट जज किसी भी तरह से सुप्रीम कोर्ट जजों से कमतर नहीं हैं और उन्हें समान संवैधानिक दर्जा प्राप्त है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट न्यायिक रूप से हाईकोर्ट के निर्णयों को पलट या संशोधित कर सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट का हाईकोर्ट पर प्रशासनिक नियंत्रण है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने ये टिप्पणियां तेलंगाना हाईकोर्ट जज के खिलाफ ट्रांसफर याचिका में अपमानजनक आरोप लगाने वाले कुछ वकीलों को जज से बिना शर्त माफ़ी मांगने का निर्देश देते हुए कीं।
Case Details : IN RE: N. PEDDI RAJU AND ORS. Versus| SMC(C) No. 3/2025
अभियुक्त द्वारा दर्ज FIR में दिए गए बयानों का इस्तेमाल दूसरे अभियुक्त के खिलाफ नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया कि अभियुक्त द्वारा FIR में दिए गए बयानों का इस्तेमाल दूसरे अभियुक्त के खिलाफ नहीं किया जा सकता। अतः कानूनी स्थिति यह है कि मामले के एक अभियुक्त द्वारा दर्ज FIR में दिए गए बयान का इस्तेमाल किसी भी तरह से दूसरे अभियुक्त के खिलाफ नहीं किया जा सकता। यहां तक कि बयान देने वाले अभियुक्त के खिलाफ भी अगर बयान दोषसिद्धि प्रकृति का है तो उसका इस्तेमाल न तो पुष्टि या खंडन के लिए किया जा सकता है, जब तक कि बयान देने वाला खुद मुकदमे में गवाह के तौर पर पेश न हो।
केस टाइटल: नारायण यादव बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
Delhi LG मानहानि मामले में मेधा पाटकर को राहत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (11 अगस्त) को नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता और एक्टिविस्ट मेधा पाटकर की दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार किया। यह आपराधिक मानहानि का मामला दिल्ली के वर्तमान उपराज्यपाल (Delhi LG) और लेफ्टिनेंट जनरल विनय कुमार सक्सेना ने 2001 में उनके खिलाफ दर्ज कराया था। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने हालांकि पाटकर पर लगाया गया एक लाख रुपये का जुर्माना रद्द कर दिया। निचली अदालत ने प्रोबेशन अवधि लागू करके उन्हें जेल की सजा से छूट दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने प्रोबेशन आदेश में संशोधन किया, जिसके तहत उन्हें समय-समय पर उपस्थित होना अनिवार्य था। इसके बजाय उन्हें मुचलके भरने की अनुमति दी।
Case Title – Medha Patkar v. VK Saxena
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