35 साल बाद मां विंध्यवासिनी ने उतारा चोला, अब नए स्वरूप में भक्तों को देंगी दर्शन

छत्तीसगढ़ के धमतरी शहर की आराध्य देवी मां विंध्यवासिनी ने करीब 35 साल बाद अपना चोला छोड़ दिया है. अब वे भक्तों को नए स्वरूप में दर्शन देंगी. भक्तों के सामने माता रानी मूल रूप में आ गई, जिसके बाद पुजारियों ने तुरंत मंदिर के पट बंद किए और मां को नया चोला पहनाकर श्रृंगार किया.

May 16, 2024 - 19:42
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35 साल बाद मां विंध्यवासिनी ने उतारा चोला, अब नए स्वरूप में भक्तों को देंगी दर्शन

धमतरी जिला स्थित मां विंध्यवासिनी अब भक्तों को नए स्वरूप में दर्शन देंगी. शहर की आराध्य देवी मां विंध्यवासिनी ने करीब 35 साल बाद अपना चोला छोड़ दिया है. इसके बाद पुजारियों ने माता रानी को नया चोला पहनाकर उनका श्रृंगार किया. अब मां को गहरे सिंदूरी रंग का चोला पहनाया गया है. 

मूल स्वरूप में प्रकट हुईं 

धमतरी जिला स्थित मां बिलाई माता मंदिर को मां विंध्यवासिनी के नाम से जाना जाता है. माता रानी शहर की आराध्य देवी कही जाती हैं. भक्तों के सामने मां करीब 35 साल पुराना चोला उताकर मूल रुप में आ गईं. जैसे ही ये वाक्या हुआ तुरंत पुजारियों ने मंदिर का पट बंद कर माता को नया चोला पहनाया और उनका श्रृंगार किया. अब माता नए स्वरुप में भक्तों को दर्शन देंगी.

गंगा में विसर्जित किया जाएगा पुराना चोला

विंध्यवासिनी मंदिर के पुजारी नारायण दुबे ने बताया कि मंदिर के पुजारियों द्वारा करीब साठ साल पहले माता को चांदी से जड़े चांदी रंग का चोला पहनाया गया था. इस चोले को करीब 35 साल पहले माता ने छोड़ दिया था. इसके बाद उन्हें गहरे सिंदूरी रंग का चोला पहनाया गया. अब करीब 35 KG वजनी माता के पुराने चोला की विधिवत पूजा-अर्चना उसे गंगा नदी में विसर्जित किया जाएगा.

500 साल पहले प्रकट हुई थी मूर्ति

पुजारियों के मुताबिक मां विध्यवासिनी की यह मूर्ति करीब 500 साल से पाषाण रुप मे स्वंय प्रकट होकर भक्तों की मनोकामना को पूर्ण करती आ रही हैं. धमतरी शहर की आराध्य देवी मां विंध्यवासिनी की महिमा और ख्याति धमतरी और देश के कोने-कोने के साथ ही विदेशों में भी फैली हुई है. दूर-दूर से भक्त माता रानी के पास अपनी मनोकामना लेकर पहुंचते हैं. 

कांकेर के राजा ने की थी अराधना

मान्यता है कि एक बार जब कांकेर के राजा नरहरदेव शिकार के लिऐ जा रहे थे उस वक्त उन्हें धनघोर जगंल में माता के दर्शन हुए. स्वप्न में दर्शन के बाद उन्होंने मां विध्यवासिनी रूप में अराधना की. तब से लेकर आज तक इस इस शक्ति स्थल में भक्ति की धारा अनवरत बह रही है. इस मंदिर में दोनों नवरात्र पर्व (चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र) में ज्योति जलाने की पंरपरा है, जो सदियों से चली आ रही है.

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