जब महात्मा गांधी ने दिया 'करो या मरो का नारा', अंग्रेजों के शासन में 'भारत छोड़ो आंदोलन' कैसे बना ताबूत में आखिरी कील?
अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नया आयाम दिया था। यह केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि एक जन क्रांति थी, जिसने अंग्रेजी शासन के ताबूत में आखिरी कील ठोक थी।
भारत छोड़ो आंदोलन, जिसे अगस्त क्रांति के नाम से भी जाना जाता है। ये भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने और भारत को स्वतंत्र करने की मांग के साथ एक जन-आंदोलन बन गया। यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ, क्योंकि इसने न केवल जनता को एकजुट किया, बल्कि अंग्रेजों को यह अहसास कराया कि भारत पर उनका शासन ज्यादा दिन नहीं चलने वाला है।
तब द्वितीय विश्व युद्ध का दौर
ब्रिटिश सरकार ने 1939-1945 के बीच भारत को बिना किसी सहमति के द्वितीय विश्व युद्ध में झोंक दिया। भारतीय नेताओं, खासकर कांग्रेस ने मांग की कि युद्ध में सहयोग के बदले भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाए। लेकिन 1942 में आए क्रिप्स मिशन ने केवल सीमित स्वशासन का प्रस्ताव दिया, जिसे भारतीय नेताओं ने ठुकरा दिया। इस निराशा और बढ़ते असंतोष के बीच महात्मा गांधी ने 'करो या मरो' का नारा देकर देशवासियों को एकजुट किया।
मुंबई में महात्मा गांधी की रैली
अंग्रेजों की नीति को देखते हुए महात्मा गांधी ने 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में रैली की। इस रैली में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित किया। महात्मा गांधी ने अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा, 'हम या तो भारत को आजाद करेंगे या इस प्रयास में अपनी जान दे देंगे।' महात्मा गांधी के इस नारे ने देशभर में आग की तरह फैलकर लाखों लोगों को सड़कों पर उतार दिया। छात्रों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं और युवाओं ने एक स्वर में अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग की।
शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी से जनता में उबाल
आंदोलन शुरू होने के कुछ घंटों बाद ही महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन यह दमन आंदोलन को कुचलने में नाकाम रहा। अंग्रेजों से गुस्साई जनता ने हड़तालें, जुलूस और तोड़फोड़ शुरू कर दिया। रेलवे स्टेशनों, डाकघरों और सरकारी कार्यालयों को निशाना बनाया गया। बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल और महाराष्ट्र में आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया। बिहार के बलिया में तो लोगों ने कुछ समय के लिए स्वतंत्र सरकार तक स्थापित कर दी
आंदोलन में छात्रों और महिलाओं की भागीदारी
नेताओं की गिरफ्तारी के बाद जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली और राम मनोहर लोहिया जैसे क्रांतिकारियों ने भूमिगत रहकर आंदोलन को दिशा दी। अरुणा आसफ अली ने मुंबई में तिरंगा फहराकर देशवासियों में जोश भरा। भूमिगत रेडियो प्रसारण और पर्चों के जरिए लोगों को संगठित किया गया। इस दौरान छात्रों और महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन को और व्यापक बनाया। अंग्रेजी शासन पर प्रभाव
भारत छोड़ो आंदोलन ने कई मोर्चों पर ब्रिटिश शासन को कमजोर किया।
जन आंदोलन से अंग्रेजों का आत्मविश्वास डगमगाया
पहली बार पूरे देश ने एक साथ अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया, जिससे ब्रिटिश प्रशासन का आत्मविश्वास डगमगाया। हड़तालों और तोड़फोड़ ने ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को भारी झटका दिया। रेल और संचार व्यवस्था ठप होने से युद्ध प्रयास प्रभावित हुए। विश्व युद्ध के बीच अमेरिका और अन्य सहयोगी देशों ने ब्रिटेन पर भारत को स्वतंत्रता देने का दबाव बढ़ाया। आंदोलन ने वैश्विक मंच पर भारत की मांग को मजबूती दी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक रूप से कमजोर ब्रिटेन को लगा कि भारत में शासन बनाए रखना अब असंभव है।
इस आंदोलन के बाद भारतीयों में स्वतंत्रता की ललक मजबूत
भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश शासन को यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय जनता अब किसी भी कीमत पर स्वतंत्रता चाहती है। इस आंदोलन ने न केवल भारतीयों में स्वतंत्रता की ललक को मजबूत किया, बल्कि ब्रिटिश सरकार को भी समझा दिया कि भारत पर उनका शासन अब कुछ महीनों या सालों की ही बात है। युद्ध की समाप्ति और आंदोलन के दबाव ने 1947 में भारत को आजादी दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
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