दिग्विजय सिंह ने एक तीर से साधे दो निशाने, कांग्रेस के कई नेताओं की बढ़ी टेंशन, विरोधी भी चौंके
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा सीट खाली करने के ऐलान से सियासी जंग छेड़ दी है. उन्होंने इस ऐलान के बाद एससी-एसटी सीएम के लिए वकालत कर दी है.
मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने बड़ा सियासी दांव खेल दिया है. उन्होंने अपनी ही पार्टी में कई नेताओं की टेंशन बढ़ा दी है. खासकर दिग्विजय सिंह ने उन नेताओं की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, जो राज्यसभा की आस लगाए बैठे हैं. दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा सीट खाली करने का ऐलान कर दिया है. साथ ही दलित आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने की वकालत कर दी है. यानी दिग्विजय सिंह ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं. दिग्विजय के बयान ने कांग्रेस के भीतर की राजनीति को फिर गरमा दिया है.
दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा जाने से किया इनकार
दिग्विजय सिंह के इस बयान ने यह साफ कर दिया है कि वो तीसरी बार राज्यसभा नहीं जाएंगे. दिग्विजय सिंह ने कहा कि वह अपनी सीट खाली कर रहे हैं. दिग्विजय सिंह ने इसी के साथ ही अपनी पार्टी से प्रदेश की राजनीति में दलितों और आदिवासियों को बेहतर स्थान देने की वकालत की है. दिग्विजय सिंह के इस ऐलान के तुरंत बाद ही पार्टी के प्रदेश अनुसूचित जाति मोर्चा अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने चिट्ठी लिखकर यह मांग कर दी है कि खाली हो रही राज्यसभा सीट पर कोई एससी वर्ग का नेता जाना चाहिए.
कांग्रेस में शुरू हुआ अंदरूनी घमासान
अप्रैल में राज्यसभा सीट खाली होने से पहले ही कांग्रेस में अंदरूनी घमासान शुरू हो गया है. कांग्रेस के अंदर दिग्विजय सिंह पहले ही अपने बयानों से मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं. पहले सीडब्ल्यूसी की बैठक में आरएसएस की तारीफ और फिर मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री के लिए एससी-एसटी वर्ग के उम्मीदवार की वकालत और अब राज्यसभा सीट खाली करने का बयान दे दिया.
इससे पहले दिग्विजय और प्रदेशाध्यक्ष की समानांतर पदयात्राएं चल रही थीं. दिग्विजय जहां मनरेगा में बदलाव के दुष्प्रभाव बता रहे थे. वहीं जीतू पटवारी बूथ चलो, गांव चलो के लिए पदयात्रा निकाल रहे थे. उस समय भी गुटबाजी की बात सामने आई थी.
24 साल बाद फिर निकला दलित एजेंडा
दिग्विजय सिंह का राज्यसभा का कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त हो रहा है. सोमवार (12 जनवरी) को उन्होंने अगला चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान किया. इसके साथ वे लगातार प्रदेश में दौरे कर विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की जमीन तैयार करने की बात कह रहे हैं. हालांकि अभी तक पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने उन्हें ऐसी कोई जिम्मेदारी नहीं सौंपी है.
इससे पहले साल 2002 में तत्कालीन दिग्विजय सरकार ने दलित एजेंडा बनवाकर उस पर काम शुरू किया था लेकिन पार्टी को मिली करारी हार के बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. अब दिग्विजय 24 साल बाद इस एजेंडे को फिर से जीवित करने का काम कर रहे हैं.
राज्यसभा के लिए कई नेताओं में रेस
सूत्र बताते हैं कि कमलनाथ ने राज्यसभा के लिए पूरी ताकत लगा दी है. जबकि जीतू पटवारी भी दिल्ली में पुनर्वास चाहते हैं. ताकि प्रदेश में गांधी परिवार के नजदीक बने रहने का फायदा उन्हें मिलता रहे. अरुण यादव और कमलेश्वर पटेल भी उम्मीद कर रहे हैं कि ओबीसी नेता और राहुल गांधी के नजदीकी होने का फायदा उन्हें जरूर मिलेगा.
जबकि मीनाक्षी नटराजन भी खुद को इस रेस में जिताऊ उम्मीदवार मानकर दिल्ली में अपनी दावेदारी जता रही हैं. फिलहाल दिग्विजय सिंह के बयान से शुरु हुई सियासत ने ना सिर्फ कांग्रेस को बल्कि विरोधियों को भी चौंका दिया है.
मामले पर क्या बोले मंत्री विश्वास सारंग?
मामले में कैबिनेट मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि कांग्रेस का अंदरूनी मामला है लेकिन दिग्विजय सिंह वह नेता है जो या तो खेलते हैं या फिर खेल बिगाड़ते हैं. बात तो तब होती जब उनके नाम का ऐलान हो जाता और वह सीट छोड़ देते, राज्यसभा तो उनको वैसे भी नहीं मिलनी थी.
इससे साफ जाहिर होता है कि मध्य प्रदेश कांग्रेस में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. दिग्विजय सिंह दलित आदिवासियों की वकालत करके ना सिर्फ सामान्य वर्ग बल्कि कांग्रेस में सबसे ज्यादा वर्चस्व रखने वाले अन्य पिछड़ा वर्ग को भी असहज कर रहा है. अगर दिग्विजय सिंह अपने सियासी दांव में कामयाब हो गए तो मुश्किलें कमलनाथ, पटवारी, अरुण यादव और कमलेश्वर पटेल के सामने खड़ी होना तय हैं.
साभार