बंगाल और पंजाब में गठबंधन नहीं फिर भी अंदर से नाराज क्यों नहीं कांग्रेस?
पंजाब की 13 और बंगाल की 42 लोकसभा सीटें विपक्षी दल अकेले लड़ेंगे. ये 55 सीटें कांग्रेस के लिए टेंशन बन गईं? नहीं, कांग्रेस ने पहले ही ऐलान किया था कि वह सभी लोकसभा सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी. करीब 50 प्रतिशत सीटों पर वह कैंडिडेट उतार सकती है. वह अपने जनाधार को समझ रही है. यही वजह है कि पंजाब और बंगाल में गठबंधन नहीं होने पर भी उसने तीखे हमले नहीं किए.
इसे क्षेत्रीय दलों की ताकत कहें या कांग्रेस की मजबूरी... भाजपा के खिलाफ बना विपक्ष का INDIA गठबंधन सीधी रेखा में नहीं है. हर राज्य में कुछ न कुछ ऐसा है जिससे भाजपा को यह कहने का मौका मिल जाता है कि इस गठबंधन की 'नेचुरल डेथ' होगी. हां, प्रह्लाद जोशी ने आज ही कहा कि इस गठबंधन का मकसद मोदी को सत्ता से दूर रखना है मगर निगेटिव एजेंडा काम नहीं करेगा. दरअसल, एक दिन पहले ही पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने सभी 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर गठबंधन की संभावना ही खत्म कर दी. कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी भड़क गए, यूसुफ पठान के आने से अधीर की अपनी सीट बहरामपुर भी फंस गई है. खैर, पंजाब और बंगाल में गठबंधन न होने से भी कांग्रेस फीलगुड महसूस कर रही होगी और इसकी वजह है.
एक कहावत है विरोधी का विरोधी अपना दोस्त होता है. गठबंधन नहीं हुआ तो क्या हुआ ममता बनर्जी और कांग्रेस का लक्ष्य एक ही है. उन्होंने गठबंधन बनाने की पहल भी एनडीए को सत्ता से बाहर करने के लिए की थी. वे कितना सफल होते हैं, यह तो भविष्य की गर्भ में है लेकिन सच्चाई यह है कि कमजोर संगठन के चलते कांग्रेस के पास ज्यादा विकल्प भी नहीं हैं. पंजाब में आम आदमी पार्टी ने एकतरफा जीत हासिल कर विधानसभा चुनाव जीता है. उत्साहित अरविंद केजरीवाल सभी 13 लोकसभा सीटों पर लड़ रहे हैं. चुनाव प्रचार भी शुरू हो गया है. बंगाल में शत्रुघ्न सिन्हा, यूसुफ पठान जैसे धुरंधर चेहरों को लाकर ममता ने भी भाजपा को सिरदर्द दे दिया है. 24 घंटे से भाजपा के लोग सोशल मीडिया टीएमसी कैंडिडेट लिस्ट में खामी ढूंढ रहे हैं.।
कांग्रेस को त्याग करना होगा
आपको याद होगा जब गठबंधन की नींव रखी जा रही थी तभी कांग्रेस ने संकेत दिए थे कि वह किसी भी त्याग के लिए तैयार है. जिस तरह से मोदी लहर में उत्तर भारत से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हुआ है, उसने उसे क्षेत्रीय दलों से हाथ मिलाने को मजबूर किया है. आज के समय में वह साउथ में सिकुड़कर रह गई है
कल जब ममता बनर्जी ने 42 सीटों के उम्मीदवार घोषित किए तो कहा जाने लगा कि इंडिया गठबंधन बिखर गया. अब क्या होगा? यह सच है कि कांग्रेस ऐसा नहीं चाहती थी लेकिन वह इससे असंतुष्ट भी नहीं होगी. वह अब प्लान बी पर सोच रही होगी. वैसे भी दोनों राज्यों में उसके पास ज्यादा स्कोप नहीं था.
राउत ने प्लान-बी का दिया इशारा
हां, आज उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना के नेता संजय राउत ने इशारा कर दिया. उन्होंने कहा कि पंजाब में AAP और कांग्रेस का गठबंधन ना होना और बंगाल में टीएमसी और कांग्रेस का साथ नहीं आना, यह INDIA अलायंस को कोई झटका नहीं है. यह एक स्ट्रैटजिक मूव है.
कांग्रेस से बेहतर पोजीशन में AAP और कांग्रेस
राजनीति की समझ रखने वाला कोई भी शख्स समझ सकता है कि दोनों ही राज्यों में सत्तारूढ़ दल यानी आप और टीएमसी मजबूत हैं. वे कांग्रेस से कहीं बेहतर पोजीशन में हैं. गठबंधन होता तो भी 2-3 सीटों से ज्यादा मिलने की उम्मीद नहीं थी. ऐसे में कांग्रेस का प्लान बी यही होगा कि चुनाव बाद नतीजे अगर थोड़ा भी संतोषजनक रहते हैं तो इन बिछड़े साथियों को फिर से जोड़ा जा सकेगा. वैसे भी जब मायावती को पीएम कैंडिडेट बनाने की चर्चा चली है तो 42 सीटों पर कमाल करने के बाद ममता बनर्जी भी दावेदार जरूर बन सकती हैं.
अब भी कांग्रेस ने खोल रखे हैं दरवाजे
हां, इसका इशारा भी कांग्रेस दे रही है. अधीर रंजन चौधरी को छोड़ दें तो बंगाल के सभी कैंडिडेट की घोषणा के बाद भी कांग्रेस नेतृत्व ने तृणमूल कांग्रेस पर तीखे बयान से परहेज किया. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि पार्टी INDIA गठबंधन के सभी सहयोगियों को साथ रखना चाहती है और पार्टनरशिप के दरवाजे बंद नहीं हैं. उन्होंने यह संभावना भी जता दी कि उम्मीदवारों के नाम वापस लेने की तारीख से पहले किसी भी समय गठबंधन हो सकता है.
यह भी हो सकता है कि अभी कांग्रेस पार्टी अपने कार्यकर्ताओं का हौसला बनाए रखने के लिए ऐसा कहे और चुनाव बाद गठबंधन पर राजी हो जाए. कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश भी बोले कि मैं नहीं जानता कि टीएमसी पर क्या दबाव था लेकिन हम पश्चिम बंगाल में अलायंस को मजबूत करना चाहते हैं. देखते हैं क्या होता है.
बताया जा रहा है कि बंगाल में कांग्रेस छह सीटें मांग रही थी. हो सकता है गठबंधन की बात कहते हुए कांग्रेस बंगाल में सीपीएम के साथ चुनाव लड़े और कुछ ही सीटों पर फोकस करे जिससे ममता बनर्जी को भी नाराज करने से बचा जा सके.
वैसे भी सिंपल फॉर्मूला यही है कि साझा यानी शेयर वही करता है जो कमजोर होता है. जिसे खुद पर यकीन हो वो अपनी सीटें आपको क्यों देगा? कांग्रेस नेतृत्व इस बात को समझ रहा होगा.
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