बंगाल की 8 सीटें और... लोकसभा चुनाव से ठीक पहले क्यों CAA लाई मोदी सरकार? इनसाइड स्टोरी
अब लागू हो चुका है. कई इलाकों में जश्न मनाया जा रहा है तो कुछ मुस्लिम नेता और विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं. चार साल पहले से यह कानून अटका था. ऐसे में यह समझना दिलचस्प है कि लोकसभा चुनाव 2024 से ठीक पहले मोदी सरकार ने इस विवादास्पद कानून को लागू क्यों किया. तस्वीर नागपुर से है लेकिन असम, बंगाल और कई राज्यों में जश्न के वीडियो आए हैं.
नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA को लोकसभा चुनाव की घोषणा होने से ठीक पहले लागू कर दिया गया है. विपक्ष टाइमिंग पर सवाल उठा रहा है. विवादास्पद कानून पारित होने के चार साल बाद केंद्र ने यह कदम उठाया है. अब पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए बिना दस्तावेज वाले गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता मिल सकेगी. असम और पश्चिम बंगाल में कई साल से यह मुद्दा गरम रहा है. कल से असम में विपक्षी दल प्रदर्शन भी करने लगे हैं. आज राज्यव्यापी हड़ताल की घोषणा की गई थी. हालांकि इसे लागू करने की अपनी वजह है. केंद्र सरकार और बीजेपी को कई सर्वे से पता चला था कि चुनाव से पहले इसे लागू करना बेहद जरूरी है. अकेले यह एक फैसला पश्चिम बंगाल की कम से कम 8 लोकसभा सीटों पर बाजी पलट सकता है.
दिसंबर 2019 में सिटिजनशिप बिल संसद में रखे जाने के चार साल बाद सोमवार को केंद्र ने सीएए कानून लागू कर दिया. पश्चिम बंगाल, असम और यूपी में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू होने के बाद इसे रोक दिया गया था. ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि बीजेपी के राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए सीएए लागू किया गया है. एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बंगाल के सीमावर्ती जिलों और अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे दूसरे राज्यों में व्यापक सर्वे के बाद सरकार ने यह फैसला लिया है.
बीजेपी के इंटरनल सर्वे में क्या था?
दूसरी तरफ मतुआ, राजबंशी जैसे बांग्लादेशी हिंदू समुदायों के साथ काम करने वाली बीजेपी की कई यूनिटों ने अपनी रिपोर्टों में बताया था कि सीएए को लागू करना जरूरी है और पश्चिम बंगाल में काफी कुछ इस पर निर्भर है. भगवा दल ने जनता का मूड भांपने के लिए यह सर्वे कराया था. बीजेपी के इंटरनल सर्वे के मुताबिक नदिया और उत्तर 24 परगना जिलों की कम से कम पांच लोकसभा सीटों पर इस फैसले का सीधा असर होगा, जबकि राज्य के उत्तरी हिस्से में 2 से तीन सीटें प्रभावित हो सकती हैं. दक्षिण बंगाल के मतुआ और उत्तरी बंगाल के राजबंशी और नामशूद्र समुदाय इस फैसले पर जश्न मना रहे हैं.
बीजेपी तक रिपोर्ट पहुंची थी कि 2019 के चुनाव घोषणापत्र में वादे के मुताबिक अगर सीएए लागू नहीं किया गया तो ओबीसी और अनुसूचित जाति के वोट घट सकते हैं या नहीं मिलेंगे.
कौन है मतुआ समुदाय
यह हिंदू शरणार्थी समूह है जो बंटवारे के समय और बाद के वर्षों में भारत आ गया. इनकी आबादी कन्फर्म नहीं है लेकिन अनुमान के मुताबिक मतुआ बंगाल की कुल आबादी का 10 से 15 प्रतिशत हो सकते हैं. ये दक्षिण बंगाल की कम से कम पांच लोकसभा क्षेत्रों में रहते हैं. इसमें से दो सीटें 2019 में भाजपा ने जीती थीं.
राजबंशी और नामशुद्र कम संख्या वाले छोटे समूह हैं जो बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थी हैं. इन्होंने बीजेपी को पिछली बार वोट किया था जिस कारण उत्तर बंगाल में तीन सीटें उसे मिल गई थीं. ये जलपाईगुड़ी, कूचबिहार और बलूरघाट लोकसभा क्षेत्रों में फैले हैं और इनकी आबादी कम से कम 40 लाख है.
विधानसभा चुनावों पर भी होगा असर
इस क्षेत्र में मौजूद ये शरणार्थी समूह अपनी पहचान के लिए सीएए के तहत नागरिकता मांग रहे थे. इनका असर विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिलेगा. सर्वे करने वाले कई वरिष्ठ नेताओं की मानें तो उत्तर 24 परगना और नदिया जिलों में कम से कम 30-33 विधानसभा सीटों में मतुआ की आबादी 40 प्रतिशत से अधिक है. लोकसभी सीट यहां से पांच से छह आती है.
पिछली बार मैनिफेस्टो में सीएए का जिक्र होने के बाद ही उत्तर 24 परगना में बीजेपी को फायदा हुआ था. दक्षिण बंगाल ममता बनर्जी का गढ़ रहा है और वहां से 21 लोकसभा सीटें आती हैं.
उत्तर 24 परगना में 33 विधानसभा सीटें हैं और 2016 के चुनाव में ममता ने 27 जीती थीं. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी के नंबर घट गए. उनकी पार्टी 12 विधानसभा सीटों पर बीजेपी से पीछे रह गई. इनमें चार एससी सीटें हैं जिसमें मतुआ की आबादी 80 फीसदी है. दक्षिण बंगाल में नदिया एक और अहम जिला है जहां मतुआ अहम फैक्टर हो सकते हैं.
बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों में सीएए के खिलाफ काफी प्रदर्शन हुए हैं. ममता बनर्जी इसे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ और भेदभावपूर्ण बताती रही हैं. अब चुनाव के नतीजे बताएंगे कि इस फैसला का किसे फायदा और नुकसान हुआ है.
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