भिंड में प्रोटोकॉल तोड़ा; मंत्री नहीं आए तो बेटे ने बांटे सरकारी प्रमाण पत्र, अफसरों ने नियम ताक पर रखे

मध्य प्रदेश में भिंड के मेहगांव में सरकारी शिविर के दौरान मंत्री की अनुपस्थिति में बेटे से प्रमाण पत्र बंटवाने का मामला, प्रशासनिक भूमिका पर उठे सवाल.

Mar 24, 2026 - 17:32
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भिंड में प्रोटोकॉल तोड़ा; मंत्री नहीं आए तो बेटे ने बांटे सरकारी प्रमाण पत्र, अफसरों ने नियम ताक पर रखे

भिंड जिले के मेहगांव में आयोजित “संकल्प से समाधान” (Sankalp Se Samadhan Abhiyan) जनसमस्या निवारण शिविर के दौरान सरकारी प्रोटोकॉल की बड़ी अनदेखी सामने आई है. कैबिनेट मंत्री की गैरमौजूदगी में अधिकारियों ने उनके बेटे से सरकारी योजनाओं के प्रमाण पत्र वितरित कराए, जिससे प्रशासनिक निष्पक्षता और नियमों के पालन पर सवाल खड़े हो गए हैं. मामले ने तब तूल पकड़ा जब प्रेस नोट में मंत्री के बेटे को जनप्रतिनिधि बताया गया. इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अफसरों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं और जांच की मांग तेज हो गई है.

जनसमस्या निवारण शिविर में क्या हुआ?

सोमवार को मेहगांव में “संकल्प से समाधान” अभियान के तहत जनसमस्या निवारण शिविर का आयोजन किया गया था. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में स्थानीय विधायक एवं कैबिनेट मंत्री राकेश शुक्ला को शामिल होना था. हालांकि, किसी कारणवश मंत्री कार्यक्रम में नहीं पहुंच सके. ऐसी स्थिति में आम तौर पर कार्यक्रम की जिम्मेदारी किसी अन्य जनप्रतिनिधि या वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को दी जाती है, लेकिन इस आयोजन में अधिकारियों ने तय व्यवस्था से अलग फैसला लिया.

मंत्री के बेटे को दिया गया मंच

मंत्री के कार्यक्रम में न पहुंचने पर अधिकारियों ने उनके बेटे आलोक शर्मा को मंच पर आमंत्रित किया और उन्हें प्रमाण पत्र वितरण की जिम्मेदारी सौंप दी. आलोक शर्मा ने मंच से विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को प्रमाण पत्र वितरित किए. यह घटनाक्रम न सिर्फ प्रशासनिक स्तर पर गंभीर सवाल खड़े करता है, बल्कि सरकारी कार्यक्रमों के लिए तय प्रोटोकॉल की खुली अनदेखी भी दर्शाता है.

‘जनप्रतिनिधि' बताने से बढ़ा विवाद

मामला तब और गंभीर हो गया, जब जनसंपर्क अधिकारी पुष्पराज सिंह की ओर से जारी प्रेस नोट में आलोक शर्मा को “जनप्रतिनिधि” बताया गया. जबकि जनप्रतिनिधि वही माना जाता है, जिसे जनता द्वारा चुना गया हो—जैसे मंत्री, सांसद, विधायक या किसी निर्वाचित निकाय का प्रतिनिधि. आलोक शर्मा ने अब तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है और उनके पास कोई संवैधानिक या प्रशासनिक पद भी नहीं है. ऐसे में उन्हें “जनप्रतिनिधि” बताना नियमों के विपरीत माना जा रहा है.

क्या कहता है सरकारी प्रोटोकॉल?

सरकारी कार्यक्रमों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय होते हैं. मंच से वितरण का कार्य केवल अधिकृत जनप्रतिनिधि या सरकारी अधिकारी ही कर सकते हैं. मंत्री की अनुपस्थिति में यह जिम्मेदारी किसी अन्य अधिकृत जनप्रतिनिधि या वरिष्ठ अधिकारी को दी जाती है. किसी निजी व्यक्ति या परिजन को मंच से सरकारी कार्य कराना प्रोटोकॉल उल्लंघन की श्रेणी में आता है. इस मामले में इन तमाम नियमों को नजरअंदाज किया गया.

सत्ता के दुरुपयोग के आरोप

पूरे घटनाक्रम को सत्ता के दुरुपयोग के रूप में देखा जा रहा है. बिना किसी अधिकार या पद के मंत्री के बेटे को सरकारी मंच देना और उनसे प्रमाण पत्र वितरित कराना प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है. घटना सामने आने के बाद जनता और राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है. लोगों का कहना है कि यदि नियमों का पालन नहीं किया गया, तो सरकारी व्यवस्थाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर असर पड़ेगा.

अब उठ रहे हैं बड़े सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी? क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी, या फिर यह मामला दबा दिया जाएगा? फिलहाल, यह पूरी घटना भिंड प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है और सरकारी प्रोटोकॉल पालन की हकीकत को उजागर करती 

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