संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में नाबालिग के लिए अलग अभिभावक जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी हिंदू नाबालिग का हित अविभाजित संयुक्त परिवार की संपत्ति में है तो उसके लिए अलग से अभिभावक नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे मामलों में परिवार का वयस्क सदस्य ही संपत्ति का प्रबंधन करता है। जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने कहा, “यदि नाबालिग का हित संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में है तो परिवार का वयस्क सदस्य चाहे पुरुष हो या महिला उस संपत्ति की देखभाल करेगा और अलग से अभिभावक नियुक्त करने की जरूरत नहीं है।”
मामला एक विधवा मां से जुड़ा था जिसने अपनी नाबालिग बेटी की प्राकृतिक अभिभावक घोषित किए जाने और उसकी संपत्ति बेचने की अनुमति के लिए मुजफ्फरनगर की अदालत में आवेदन किया। नाबालिग की दादी ने भी इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने मां को अभिभावक तो मान लिया लेकिन संपत्ति बेचने की अनुमति नहीं दी। इस फैसले से असंतुष्ट होकर मां ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाइकोर्ट ने हिंदू अल्पसंख्यक एवं अभिभावक अधिनियम 1956 की धाराओं का हवाला देते हुए कहा कि पिता की मृत्यु के बाद मां ही नाबालिग की प्राकृतिक अभिभावक होती है। साथ ही अधिनियम की धारा 12 के अनुसार, यदि संपत्ति संयुक्त परिवार की अविभाजित संपत्ति है तो उसके लिए अलग से अभिभावक नियुक्त नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि अभिभावक और संरक्षक अधिनियम, 1890 के प्रावधानों को हिंदू कानून के साथ मिलाकर पढ़ना जरूरी है, क्योंकि यह अधिनियम पूरक रूप से लागू होता है। मामले में यह भी सामने आया कि मां अपनी बेटी की उच्च शिक्षा के लिए संपत्ति बेचना चाहती है। अदालत ने इसे नाबालिग के हित में मानते हुए कहा कि प्राकृतिक अभिभावक और परिवार की वयस्क सदस्य होने के नाते मां को संपत्ति बेचने का अधिकार है। अंततः हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए मां को नाबालिग की भलाई के लिए संपत्ति बेचने की अनुमति दी।
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