संसद पहुंचे निशिकांत दुबे के हाथों में कौन सी पांच किताबें थीं, इनमें गांधी-नेहरू परिवार के बारे में क्या लिखा?

बीते दिनों राहुल गांधी ने संसद में एक अप्रकाशित किताब का जिक्र किया था, जिसको लेकर हंगामा हुआ. अब इसी क्रम में निशिकांत दुबे आज लोकसभा में कुछ किताबों का जिक्र कर बैठे, जिसमें नेहरू-गांधी परिवार के बारे में लिखा है.

Feb 4, 2026 - 19:51
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संसद पहुंचे निशिकांत दुबे के हाथों में कौन सी पांच किताबें थीं, इनमें गांधी-नेहरू परिवार के बारे में क्या लिखा?

बजट सत्र के दौरान लोकसभा में अचानक माहौल गरमा गया. विपक्ष कुछ समझ पाता, उससे पहले ही बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे अपने हाथों में किताबों का एक ढेर लेकर खड़े हो गए. ये कोई साधारण किताबें नहीं थीं, बल्कि वे किताबें थीं जिनमें देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर नेहरू-गांधी परिवार के कई सदस्यों के निजी, राजनीतिक और ऐतिहासिक पहलुओं का जिक्र है. आइए जानें कि इन किताबों को लेकर संसद में इतना मुद्दा गर्म क्यों हो गया और आखिर इन किताबों में ऐसा क्या लिखा है, जिस पर विवाद शुरू हो गया. 

संसद में क्यों उठा किताबों का विवाद?

बुधवार को लोकसभा में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कुछ पुस्तकों का हवाला देते हुए कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार पर सवाल उठाए. जैसे ही उन्होंने किताबों के अंश पढ़ने शुरू किए, विपक्षी सांसदों ने कड़ा ऐतराज जताया. उनका कहना था कि संसद के भीतर इस तरह की आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करना नियमों के खिलाफ है. हंगामा इतना बढ़ा कि सदन की कार्यवाही दो बार स्थगित करनी पड़ी. यह पूरा मामला ऐसे समय सामने आया, जब दो पहले राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे की अप्रकाशित किताब के हवाले डोकलाम विवाद का जिक्र छेड़ा, जिसको लेकर बीते तीन दिन से देश की राजनीति गरमाई हुई है. 

पहली किताब: एडविना एंड नेहरू

निशिकांत दुबे जिन पुस्तकों का हवाला दे रहे थे, उनमें सबसे चर्चित नाम “एडविना एंड नेहरू” का है. यह संदर्भ पामेला हिक्स की किताब डॉटर्स ऑफ एम्पायर से आता है. पामेला, एडविना माउंटबेटन की बेटी थीं. इस किताब को लेकर बीबीसी सहित कई ऐतिहासिक रिपोर्ट्स के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू और एडविना माउंटबेटन के बीच गहरा भावनात्मक और बौद्धिक रिश्ता था. किताब में कहा गया है कि दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते थे, लंबे पत्र लिखते थे और दोनों के संबंध बहुत करीबी और निजी थे. हालांकि, लेखिका और इतिहासकारों ने यह भी साफ किया है कि इस रिश्ते को शारीरिक संबंध के रूप में पेश करना सही नहीं है. पामेला हिक्स ने खुद ऐसी अटकलों से इनकार किया था. 

दूसरी किताब: रेमिनिसेंसेज ऑफ द नेहरू एज

दूसरी किताब का नाम है Reminiscences of the Nehru Age, जिसे एम.ओ. मथाई ने लिखा था. मथाई, नेहरू के दौर में प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े रहे थे. इस किताब में नेहरू युग की अंदरूनी राजनीति, प्रशासनिक कामकाज और उस समय के सत्ता तंत्र की तस्वीर पेश की गई है.किताब में नेहरू के निजी जीवन, उनके करीबी नेताओं और इंदिरा गांधी की शुरुआती राजनीतिक भूमिका पर भी चर्चा है. बीबीसी की रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह किताब अपने समय में काफी विवादित रही थी, क्योंकि इसमें सत्ता के भीतर के अनुभव सीधे शब्दों में बताए गए थे. निशिकांत दुबे का कहना था कि इस किताब में एम.ओ. मथाई और इंदिरा गांधी के व्यक्तिगत संबंधों का भी जिक्र है. 

तीसरी किताब: द रेड साड़ी

स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की किताब The Red Sari भी उन पुस्तकों में शामिल थी, जिनका जिक्र संसद में हुआ. बीबीसी की मानें तो यह सोनिया गांधी के जीवन पर आधारित एक काल्पनिक जीवनी मानी जाती है. इसमें उनके इटली से भारत आने, राजीव गांधी से विवाह और बाद में कांग्रेस अध्यक्ष बनने तक के सफर को कथात्मक अंदाज में दिखाया गया है. इस किताब को लेकर विवाद इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस का कहना रहा है कि इसमें कई घटनाओं का नाटकीय और तथ्यात्मक रूप से गलत चित्रण किया गया है. इसी वजह से यह किताब लंबे समय तक भारत में प्रकाशित नहीं हुई. निशिकांत दुबे का कहना है कि इस किताब में यह भी लिखा है कि सोनिया गांधी ने किस तरह से 10 साल तक करप्शन किया और सरकार हो चलाया.

चौथी किताब: इंदिरा – द लाइफ ऑफ इंदिरा नेहरू गांधी

कैथरीन फ्रैंक द्वारा लिखी गई यह जीवनी इंदिरा गांधी के राजनीतिक और निजी जीवन पर केंद्रित है. इसमें 1960 और 1970 के दशक की राजनीति, आपातकाल और उस दौर के प्रभावशाली लोगों का जिक्र मिलता है. किताब में योग गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी के प्रभाव की भी चर्चा है. 1960 और 1970 के दशक की राजनीति में इंदिरा गांधी और योग शिक्षक धीरेंद्र ब्रह्मचारी का नाम अक्सर चर्चा में रहा. कैथरीन फ्रैंक की जीवनी और बीबीसी की मानें तो ब्रह्मचारी शुरुआत में योग सिखाने के उद्देश्य से सत्ता के करीब आए, लेकिन समय के साथ उनका दायरा केवल योग तक सीमित नहीं रहा. प्रधानमंत्री आवास और पीएमओ तक उनकी सहज पहुंच, साथ ही संजय गांधी के साथ निकटता ने उन्हें सत्ता के गलियारों में खास पहचान दिलाई. इसी कारण कई लोग उन्हें उस दौर का अत्यंत प्रभावशाली चेहरा मानते थे. 

धीरेंद्र ब्रह्मचारी का सफर योग गुरु से आगे बढ़कर राजनीतिक सलाहकार जैसे रोल तक जा पहुंचा था. कहा जाता है कि वे पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू को योग सिखाते थे और बाद में इंदिरा गांधी के संपर्क में आए. आपातकाल के समय उनका असर और बढ़ा, जब उन्हें सरकारी सुविधाएं, आवास और संस्थानों के लिए मदद मिली. उस दौर में उनकी पहुंच इतनी व्यापक बताई जाती है कि मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी भी उनसे मिलने को महत्व देते थे.

हालांकि, इस प्रभाव के साथ विवाद भी जुड़े हैं. उन पर हथियार जमा करने, निजी विमान मंगाने और नियमों को दरकिनार कर विशेष अनुमति लेने जैसे आरोप लगे. कुछ लेखकों ने उनके और इंदिरा गांधी के रिश्ते को बेहद नजदीकी बताया, जबकि अन्य ने इन दावों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया हुआ माना है. 

कैथरीन फ्रैंक की किताब में यह उल्लेख मिलता है कि ब्रह्मचारी को इंदिरा गांधी के निजी कक्ष तक जाने की अनुमति थी, जो उस समय असामान्य मानी जाती थी. इसी नजदीकी के चलते उन्हें भारत का रासपुतिन तक कहा गया. दूसरी ओर, इंदिरा गांधी के करीबी रहे पी.डी. टंडन ने इन बातों को अफवाह बताते हुए कहा कि नेहरू स्वयं ब्रह्मचारी से योग सीखते थे और उन्हीं के कहने पर वे इंदिरा को योग सिखाने आए थे. 

शाह आयोग की रिपोर्ट में यह जरूर दर्ज है कि ब्रह्मचारी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर संपत्ति और सुविधाएं हासिल कीं. फ्रैंक के अनुसार, जैसे-जैसे संजय गांधी का राजनीतिक असर बढ़ा, वैसे-वैसे ब्रह्मचारी की पकड़ भी मजबूत होती गई. आपातकाल के दौरान एक अमेरिकी विमान खरीदने और कश्मीर में निजी हवाई पट्टी की अनुमति जैसे फैसलों ने इस प्रभाव को और विवादों में ला दिया. कुल मिलाकर, यह अध्याय भारतीय राजनीति के उस दौर की ताकत, नजदीकी और बहसों की जटिल तस्वीर पेश करता है.

पांचवीं किताब: फ्रॉम रिवेली टू रिट्रीट

जनरल एस.पी.पी. थोरात की किताब From Reveille to Retreat 1962 के भारत-चीन युद्ध से पहले की सैन्य तैयारियों पर रोशनी डालती है. बीबीसी के अनुसार इसमें बताया गया है कि किस तरह भारत-चीन सीमा पर खतरे के संकेत मिलने के बावजूद सैन्य स्तर पर पर्याप्त तैयारी नहीं हो पाईं. यह किताब नेहरू सरकार की नीतियों, रणनीतिक सोच और उस समय की चुनौतियों को एक सैन्य अधिकारी के नजरिए से सामने रखती है. इस किताब के अनुसार नेहरू का मानना था कि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मुख्य धारा में जगह मिलनी चाहिए, लेकिन इसी सोच के कारण सीमा की सुरक्षा और तैयारियों पर अपेक्षित फोकस नहीं रह पाया और भारत चीन से 1962 का युद्ध हार गया. 

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