सियासी सड़क के 'U टर्न' पर लगा जाम! नीतीश के बाद कई नेता लाइन में, 2014 से भी बड़ा होगा NDA का कुनबा

2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों से अब तक कौन-कौन एनडीए छोड़कर गया और वापस आया, इस पर चर्चा करना जरूरी है. क्योंकि पुराने साथी फिर से यूटर्न लेने की फिराक में हैं. कुछ तो ले भी चुके हैं.

Feb 8, 2024 - 20:29
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सियासी सड़क के 'U टर्न' पर लगा जाम! नीतीश के बाद कई नेता लाइन में, 2014 से भी बड़ा होगा NDA का कुनबा

एक कहावत है कि सुबह का भूला अगर शाम को घर वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते हैं. राजनीति में अगर इस कहावत को फिट करना हो तो.. ये कहा जाए कि उस चुनाव का भूला अगर इस चुनाव में साथ आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते हैं, तो शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी. भारतीय राजनीति में गठबंधन का दौर और सिलसिला कोई नया नहीं है. लेकिन पलट-पलटकर गठबंधन बदलना, ये कुछ नया है. इंडिया गठबंधन तो यूपीए की जगह ही बना, उसकी बहुत बात हुई, कुछ साथी जुड़े कुछ निकल लिए. बस अकेले कांग्रेस ने फिलहाल मोर्चा संभाल रखा है. लेकिन अगर एनडीए गठबंधन की बात करें तो इसका भी अपना इतिहास है. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों से अब तक कौन-कौन एनडीए छोड़कर गया और वापस आया, इस पर चर्चा करना जरूरी है. क्योंकि कई पुराने साथी वापसी के लिए लाइन में लगे हैं.

असल में एनडीए गठबंधन की कर्ता-धर्ता बीजेपी ही है. एनडीए में मोदी युग आने के बाद 2014 और 2019 लोकसभा चुनावों में कई पुराने साथियों ने अपनी स्थिति बदली. अब जबकि 2024 का चुनाव एकदम सिर पर है, तो उन साथियों के बारे में बात करेंगे जो एक बार फिर से एनडीए में वापसी कर चुके हैं या उनकी वापसी की प्रबल संभावना है. बस उन्हें यूटर्न लेना है, जैसा कि हाल में नीतीश बाबू कर चुके हैं.

एनडीए में जब मोदी-शाह युग आया

2013 में जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तो 29 पार्टियां एनडीए में थीं. आम चुनाव में भाजपा ने अकेले 282 सीटें जीती थीं, जबकि एनडीए के अन्य 11 साथी 54 सीटें जीतने में कामयाब हुए थे. चुनाव के बाद भी कई दल एनडीए में आए, लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 5 साल में 16 पार्टियों ने एनडीए छोड़ दिया

लोकसभा चुनाव 2014 के आसपास कौन गया?

2014 लोकसभा चुनाव के ठीक पहले नीतीश बाबू ने ही अलग होने की बोहनी कर दी. उनकी जनता दल यूनाइटेड एनडीए से अलग हुई. फिर लोकसभा चुनाव के बाद कुछ क्षेत्रीय दलों ने जैसे हरियाणा में हरियाणा जनहित कांग्रेस, तमिलनाडु में एमडीएमके ने साथ छोड़ा. वैसे तो 2014 से 2019 के बीच तेलगू देशम पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, स्वाभिमानी शेतकारी संगठन, राष्ट्रीय लोक समता दल, हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा और असम गण परिषद जैसी पार्टियां भी अलग हुईं लेकिन लाइमलाइट नीतीश बाबू बटोर ले गए थे.

लोकसभा चुनाव 2019 के पहले किस-किस ने साथ छोड़ा

अगर 2019 की बात करें तो चुनाव के पहले दक्षिण से एनडीए को झटका लगा जब तेलुगु देशम पार्टी के चीफ चंद्रबाबू नायडू ने एनडीए का साथ छोड़ दिया. वहीं हिंदुस्तान अवाम मोर्चा, नगा पीपुल्स फ्रंट ने भी एनडीए का साथ छोड़ दिया. बिहार के दो और दल आरएलएसपी और वीआईपी ने भी एनडीए का साथ छोड़ दिया. इस चुनाव में एनडीए में शामिल 21 दलों ने चुनाव लड़ा था. इनमें भाजपा समेत 13 पार्टियां सीट जीतने में कामयाब रही थीं. एनडीए को कुल 354 सीटें मिलीं. जिनमें से भाजपा को 303 और अन्य 12 दलों को 51 सीटें मिलीं. 

2019 के बाद: शिवसेना-अकाली ने साथ छोड़ा, जेडीयू ने भी दूसरा यूटर्न लिया साथ छोड़ा 

एनडीए गठबंधन में शामिल बीजेपी की सबसे मजबूत सहायक शिवसेना ने साथ छोड़ा हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना एनडीए का हिस्सा थी. 2022 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के बाद शिवसेना ने साथ छोड़ दिया और महा विकास अघाड़ी (MVA) के साथ मिलकर सरकार बनाई. अकाली दल भी 2019 के लोकसभा चुनाव में अकाली दल एनडीए का हिस्सा था. 2020 में कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल ने एनडीए छोड़ दिया. नीतीश बाबू की जेडीयू वापस आ गई थी और वह 2019 के चुनाव में एनडीए का हिस्सा थी लेकिन 2022 में बिहार विधानसभा चुनावों के बाद अलग हो गई.

अब 2024 चुनाव से पहले कौन-कौन कर रहा घर(एनडीए) वापसी

यहां भी नीतीश बाबू ने ही बड़ी बोहनी की और इंडिया गठबंधन से अलग हुए. उन्होंने तो यह भी कह दिया कि वे पुराने साथी हैं, अब वो इन्हीं के साथ रहेंगे. उधर टीडीपी सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू अमित शाह से मुलाकात कर चुके हैं. उधर ओडिशा के पटनायक पहले ही एनडीए पर नरम दिल हैं, वो कमोबेश तटस्थ स्थिति में हैं. खबर यह भी है कि अकाली दल से बीजेपी की तगड़ी बातचीत चल रही है. जयंत चौधरी बस ऐलान ही करने वाले हैं. एक और चौंकाने वाली बात है कि उद्धव ठाकरे के तेवर भी एनडीए को लेकर नरम पड़ गए हैं. 

एनडीए के बढ़े हुए कुनबे की बिसात पर चुनाव

इस तरह यह तो तय है कि इस बार एनडीए गठबंधन एक बार फिर से विपक्षी गठबंधन पर हावी पड़ रहा है. लेकिन इस शक्ल में आने के लिए एनडीए के नए और पुराने साथियों को इतनी बार यू-टर्न लेने पड़े हैं, कि शायद वही असली राजनीति है, वही गठबंधन राजनीति का असली धर्म भी है. अब देखना है कि एनडीए के इतने साथियों के बाद क्या पीएम मोदी का चार सौ पार का नारा सफल होता है या फिर कांग्रेस के लिए भी कुछ खुश होने की गुंजाइश बचेगी.

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