प्रधानमंत्री पर अभद्र टिप्पणी करने वाले को कितनी सजा? जानें नियम

मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा पीएम मोदी पर की गई अभद्र टिप्पणी के बाद कानूनी प्रावधानों पर चर्चा तेज हो गई है. पीएम पर अभद्र टिप्पणी के मामले में मानहानि, सार्वजनिक शांति भंग, आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई हो सकती है.

Oct 26, 2026 - 16:12
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प्रधानमंत्री पर अभद्र टिप्पणी करने वाले को कितनी सजा? जानें नियम

देश के राजनीतिक गलियारों में उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया जब पटना में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बेहद अशोभनीय टिप्पणी कर दी. कार्यक्रम में भाषण के दौरान जब माहौल गरमाया, तो वहां मौजूद एक नागरिक की टिप्पणी के जवाब में खरगे ने पीएम मोदी के पिता को लेकर ऐसा बयान दे डाला जिस पर अब भारी राजनीतिक घमासान छिड़ गया है. इस घटना के बाद से ही आम जनता के मन में यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि देश के प्रधानमंत्री या किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे शीर्ष नेता के खिलाफ अपमानजनक भाषा या अभद्र टिप्पणी करने पर कानूनन किस तरह की सजा और किन धाराओं का सामना करना पड़ सकता है.

क्या पीएम पर अभद्र टिप्पणी के लिए है कोई विशेष कानून?

भारतीय न्याय प्रणाली में देश के प्रधानमंत्री पद पर आसीन व्यक्ति के लिए कोई अलग से या विशेष आपराधिक कानून नहीं बनाया गया है. इसका मतलब यह है कि देश के आम नागरिक और प्रधानमंत्री पर की जाने वाली टिप्पणियों के मामलों में कानूनी प्रक्रिया एक समान ही लागू होती है. हालांकि, फर्क सिर्फ इस बात से पड़ता है कि बयान देने वाले व्यक्ति की नीयत क्या थी, उसने किस सार्वजनिक मंच का इस्तेमाल किया और उसके शब्दों का समाज या देश की व्यवस्था पर क्या असर पड़ा. पुलिस और अदालतें इन सभी परिस्थितियों को बारीकी से परखने के बाद ही तय करती हैं कि मामला किस श्रेणी में आता है और आरोपी के खिलाफ किस धारा के तहत कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए.

मानहानि के मामलों में क्या है सजा?

यदि कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री या किसी अन्य प्रतिष्ठित सार्वजनिक हस्ती के खिलाफ ऐसी अभद्र टिप्पणी करता है जिससे उनकी निजी या राजनीतिक प्रतिष्ठा को भारी ठेस पहुंचती है, तो उस पर कानूनी रूप से मानहानि का मुकदमा दर्ज किया जा सकता है. भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 356 के तहत यह प्रावधान किया गया है. यदि अदालत में मानहानि का आरोप पूरी तरह से साबित हो जाता है, तो दोषी व्यक्ति को अधिकतम दो साल तक की जेल की सजा, आर्थिक जुर्माना या फिर जेल और जुर्माना दोनों एक साथ भुगतने पड़ सकते हैं.

सार्वजनिक शांति भंग और अभद्रता पर नियम

किसी भी खुली जनसभा, सड़क या चौराहे जैसे सार्वजनिक स्थान पर यदि कोई शख्स जानबूझकर अपमानजनक शब्दों या अभद्रता का प्रयोग करता है, तो उसे गंभीर अपराध माना जाता है. BNS की धारा 352 के अंतर्गत सार्वजनिक स्थल पर अशिष्टता या बदतमीजी फैलाने पर कानूनी कार्रवाई की जाती है. इसके अलावा, यदि किसी बयान का मकसद सीधे तौर पर देश में हिंसा भड़काना या कानून-व्यवस्था की स्थिति को बिगाड़ना होता है, तो शांति भंग करने के इरादे से अपमान की धाराओं के तहत पुलिस तुरंत एक्शन लेती है. इस तरह के मामलों में अदालत के आदेश पर तीन महीने तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान तय किया गया है.

सोशल मीडिया और अफवाह फैलाने पर सख्ती

आज के डिजिटल दौर में सिर्फ मंच से ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए भी आपत्तिजनक टिप्पणियां तेजी से वायरल हो जाती हैं. यदि कोई यूजर फेसबुक, एक्स या किसी अन्य डिजिटल माध्यम से ऐसी भड़काऊ पोस्ट या बयान साझा करता है जिससे समाज में द्वेष, नफरत या अशांति फैलने का खतरा पैदा होता है, तो BNS की धारा 197 लागू होती है. ऐसी स्थिति में दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की जेल की सजा या भारी जुर्माना लगाया जा सकता है. इसके साथ ही, आईटी एक्ट के कड़े प्रावधानों के तहत भी साइबर सेल की ओर से अलग से कानूनी शिकंजा कसा जा सकता है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी सीमाएं

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत देश के हर नागरिक को बोलने और अपनी बात रखने की यानी अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता दी गई है, जिसके अंतर्गत सरकार या नेताओं की नीतियों की आलोचना भी शामिल है. लेकिन यह अधिकार पूरी तरह असीमित नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत इस पर कुछ उचित प्रतिबंध भी लगाए गए हैं, जिसके दायरे में देश की एकता, अखंडता, सार्वजनिक शालीनता और मानहानि जैसे विषय आते हैं. गुस्से में की गई सामान्य आलोचना और कानूनी रूप से अपराध बनने वाली अभद्र भाषा के बीच की बारीक रेखा तय करने का अधिकार पूरी तरह से न्यायपालिका के पास सुरक्षित होता है, जो हर मामले की गंभीरता को देखकर फैसला करती है.

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