लाल आतंक खत्म; पहली बार बस्तर दशहरा में शामिल हुए 50 गांवों के देवी-देवता, आज मुरिया दरबार में राष्ट्रपति
सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर के अबूझमाड़ समेत पूर्व नक्सल प्रभावित इलाकों के करीब 50 गांवों के देवी-देवता पहली बार विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा में शामिल हुए. वहीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आज जगदलपुर पहुंचकर मुरिया दरबार और आमसभा में भाग लेंगी.
रायपुर:
छत्तीसगढ़ के विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा इस वर्ष कई मायनों में ऐतिहासिक बन गया है. नक्सलवाद के खात्मे के बाद पहली बार सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर के अबूझमाड़ समेत दूरस्थ इलाकों के करीब 50 गांवों के देवी-देवता इस महापर्व में शामिल हुए हैं. वर्षों तक सुरक्षा कारणों और पहुंच की समस्याओं के चलते इन क्षेत्रों की भागीदारी सीमित रही थी, लेकिन इस बार बड़ी संख्या में ग्रामीण अपने आराध्य देवताओं के साथ जगदलपुर पहुंचे हैं. बढ़ी हुई भागीदारी और देशभर से पहुंचे श्रद्धालुओं तथा पर्यटकों ने बस्तर दशहरा को नई पहचान दी है.
नक्सल प्रभाव खत्म होने के बाद बढ़ी भागीदारी
बस्तर दशहरा में इस वर्ष नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की उल्लेखनीय भागीदारी देखने को मिली. सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर जिले के दूरस्थ गांवों के साथ-साथ पड़ोसी ओडिशा से भी देवी-देवताओं को उत्सव में लाया गया. न्यूज एजेंसी एएनआई के अनुसार 31 मार्च 2026 को नक्सल प्रभाव समाप्त होने के बाद पहली बार इन क्षेत्रों के ग्रामीण बिना किसी भय के बड़ी संख्या में अपने देवी-देवताओं के साथ जगदलपुर पहुंचे. इससे पर्व की भव्यता और बढ़ गई है.ऐ
आज बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में शामिल होंगी राष्ट्रपति
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शुक्रवार को सुबह 11:15 बजे जगदलपुर एयरपोर्ट पहुंचेंगी. इसके बाद वह मां दंतेश्वरी मंदिर में पूजा-अर्चना करेंगी. निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सुबह 11:37 बजे से दोपहर 12:35 बजे तक वह सिरहासार भवन में आयोजित मुरिया दरबार में शामिल होंगी.
मुरिया दरबार को एक पारंपरिक आदिवासी सभा या ‘आदिम जन संसद' माना जाता है, जिसका आयोजन बस्तर दशहरा उत्सव के हिस्से के रूप में किया जाता है.
मुरिया दरबार बस्तर दशहरा की सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक परंपराओं में से एक माना जाता है. मुरिया दरबार में शामिल होने के बाद राष्ट्रपति लालबाग मैदान में आयोजित आमसभा को भी संबोधित करेंगी.
अबूझमाड़ से भी पहुंचे देवी-देवता
बस्तर दशहरा की व्यवस्थाओं से जुड़े पटवारी सत्यनारायण सेठिया ने बताया कि पहली बार अबूझमाड़ क्षेत्र सहित कई गांवों के देवी-देवता उत्सव में शामिल हुए हैं. उन्होंने कहा कि सुकमा जिले और बीजापुर के कई इलाकों से भी पहली बार इतनी बड़ी संख्या में देवी-देवताओं का आगमन हुआ है. उनके अनुसार लोगों की मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति गहरी आस्था तथा क्षेत्र में सामान्य हुई परिस्थितियां इसकी बड़ी वजह हैं. सेठिया ने बताया कि उनके कार्यकाल में यह सबसे बड़ी धार्मिक भागीदारी रही है, विशेषकर मौली परगांव और भीतर रैनी जैसी प्रमुख रस्मों के दौरान.
SP ने कहा- सड़कों से लेकर आयोजन स्थल तक दिखा उत्साह
बस्तर के पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने बताया कि बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर के अबूझमाड़ जैसे दूरस्थ इलाकों से ग्रामीण अपने देवी-देवताओं के साथ जगदलपुर पहुंचे हैं. उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा पूरे क्षेत्र की संस्कृति और इतिहास से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण आयोजन है. पहले जिन गांवों के लोग पहुंच की समस्याओं और सुरक्षा कारणों से इस पर्व का हिस्सा नहीं बन पाते थे, वे इस बार बड़ी संख्या में शामिल हुए हैं. एसपी के अनुसार लगभग 50 ऐसे गांवों की भागीदारी दर्ज की गई है, जो पहले व्यावहारिक रूप से इस आयोजन से दूर थे. सड़कों और आयोजन स्थलों पर उमड़ी भीड़ लोगों के उत्साह को दर्शाती है.
954 देवी-देवता हुए शामिल
इस वर्ष बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्मों में रिकॉर्ड भागीदारी दर्ज की गई. मौली परगांव अनुष्ठान में 954 देवी-देवता शामिल हुए, जबकि भीतर रैनी में 461 देवी-देवताओं की उपस्थिति दर्ज की गई. इसके अलावा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक कार्यक्रमों में भी बड़ी संख्या में देवी-देवता और श्रद्धालु शामिल हुए.
देश-विदेश से पहुंचे पर्यटक
बस्तर दशहरा की बढ़ती लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस वर्ष छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों, देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों से भी बड़ी संख्या में पर्यटक जगदलपुर पहुंचे हैं. स्थानीय प्रशासन के अनुसार बढ़ती भागीदारी और पर्यटकों की संख्या ने क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को नई मजबूती दी है.
पिछली बार अमित शाह आए थे बस्तर
पिछले वर्ष केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुरिया दरबार में शामिल हुए थे, जबकि इस वर्ष राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मौजूदगी ने आयोजन की महत्ता को और बढ़ा दिया है. नक्सल प्रभाव खत्म होने के बाद पहली बार दूरस्थ गांवों के देवी-देवताओं की भागीदारी और राष्ट्रपति की उपस्थिति ने बस्तर दशहरा 2026 को ऐतिहासिक बना दिया है.
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