ये है पाकिस्तान का ताजमहल, हिंदू राजा ने अपनी मोहब्बत के लिए कराया था निर्माण
मोहट्टा पैलेस एक हिंदू कारोबारी द्वारा अपनी बीमार पत्नी के प्रति प्रेम का अनूठा प्रतीक है, जो विभाजन के बाद सरकारी अधिग्रहण की भेंट चढ़कर इतिहास का एक अहम हिस्सा बन गया. आइए इसके बारे में और जानें.
कराची के क्लिफ्टन तट की ओर बढ़ते ही गुलाबी और पीले पत्थरों से तराशी गई एक बेहद भव्य और ऐतिहासिक इमारत ध्यान खींच लेती है. इस विशाल विरासत को मोहट्टा पैलेस के नाम से जाना जाता है, जिसे लोग पाकिस्तान का ताजमहल भी कहते हैं. मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी बेगम की मौत के बाद उनकी याद में ताजमहल बनवाया था, लेकिन सिंध के एक मशहूर हिंदू उद्योगपति सेठ शिव रतन चंद्र मोहट्टा ने अपनी बीमार पत्नी की सांसें बचाने और उन्हें ताजी हवा देने के लिए उनकी जिंदगी में ही इस महल का निर्माण कराया था. आइए इस बारे में और जानते हैं.
मोहट्टा परिवार का कराची के विकास में योगदान
सेठ शिव रतन चंद्र मोहट्टा मारवाड़ी समुदाय के एक बड़े उद्योगपति थे. उन्होंने कराची में लोहे के विशाल कारखाने स्थापित करने के साथ-साथ सिंध के खदरो क्षेत्र में चीनी मिल की शुरुआत की थी. वर्ष 1939 में चीनी के परिवहन को आसान बनाने के लिए उन्होंने अपनी निजी रेल की पटरी तक बिछवाई थी. उनके छोटे भाई गोपाल गोरधन दास मोहट्टा ने कराची के प्रसिद्ध हिंदू जिमखाना का निर्माण कराया था. इस तरह इस परिवार ने शहर के बुनियादी और सांस्कृतिक ढांचे में ऐतिहासिक योगदान दिया था.
जानलेवा बीमारी और पत्नी से मोहब्बत से उपजा विचार
मोहट्टा पैलेस के निर्माण के पीछे कोई व्यावसायिक मंशा नहीं थी, बल्कि यह पूरी तरह से एक पति का अपनी पत्नी के प्रति अगाध प्रेम था. उनकी पत्नी एक गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं, जिसके इलाज के लिए डॉक्टरों ने उन्हें समुद्र के किनारे की साफ और ताजी हवा में रहने की सलाह दी थी. सेठ मोहट्टा ने अपनी जीवनसंगिनी के स्वास्थ्य में सुधार के लिए क्लिफ्टन के समुद्री किनारे पर एक भव्य रिहाइशी बंगला बनाने का फैसला किया, जो आगे चलकर एक स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना बन गया.
जयपुर के वास्तुकार और राजस्थानी वास्तुकला
वर्ष 1927 में बनकर तैयार हुई इस ऐतिहासिक इमारत का नक्शा प्रसिद्ध वास्तुकार अहमद हुसैन आगा ने तैयार किया था, जिन्हें विशेष रूप से जयपुर से कराची बुलाया गया था. उन्होंने हिंदू जिमखाना और चैंबर ऑफ कॉमर्स जैसी इमारतों का डिजाइन भी बनाया था. मोहट्टा पैलेस को एंग्लो-मुगल और राजस्थानी शैली में ढाला गया है. इसके निर्माण में जोधपुर से लाए गए गुलाबी पत्थरों और स्थानीय गिजरी क्षेत्र के पीले पत्थरों का बेहद कलात्मक संगम देखने को मिलता है.
मोहट्टा महल की बनावट नक्काशी और सुरंग का रहस्य
इस तीन मंजिला पैलेस की खूबसूरती इसके विशाल गुंबदों, नक्काशीदार मेहराबों, मीनारों और रंगीन टाइलों से झलकती है. इसमें बर्मा की मजबूत टीक लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है और दीवारों पर मोर तथा गेंदे के फूलों की नक्काशी की गई है. किसी जमाने में इसकी छत पर एक सुंदर मंदिर भी स्थित था. महल के अंदर से पास के एक मंदिर तक जाने के लिए एक गुप्त सुरंग बनाई गई थी, ताकि परिवार के लोग सुरक्षित तरीके से पूजा-पाठ के लिए जा सकें, जिसे बाद के दौर में बंद कर दिया गया.
विभाजन का दौर और देश छोड़ने की मजबूरी
वर्ष 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद सेठ शिव रतन मोहट्टा कराची में ही बसना चाहते थे, लेकिन नए प्रशासनिक तंत्र के दबाव के कारण उन्हें शहर छोड़ना पड़ा. सरकार विदेश मंत्रालय का कार्यालय बनाने के लिए उनकी इस प्रिय इमारत को अधिग्रहित करना चाहती थी. जब उनसे महल खाली करने को कहा गया, तो उन्होंने दुख और स्वाभिमान के साथ महल की चाबियां अपने मैनेजर को सौंप दीं और एक भावुक संदेश छोड़कर मुंबई चले गए.
जिन्ना से मुलाकात और सरकारी अधिग्रहण की कहानी
पाकिस्तान के वरिष्ठ अधिकारी सैयद हाशिम रजा के संस्मरणों के अनुसार, 14 अगस्त की शाम गवर्नर जनरल हाउस में एक समारोह के दौरान सेठ मोहट्टा ने मोहम्मद अली जिन्ना से अपने पसंदीदा घर को बचाने का व्यक्तिगत अनुरोध किया था. हालांकि, जिन्ना ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से असमर्थता जताई. आखिरकार, इस इमारत में विदेश मंत्रालय का दफ्तर खोल दिया गया. चूंकि क्लिफ्टन उस समय शहर से दूर था, इसलिए कर्मचारियों के लिए सदर एम्प्रेस मार्केट से विशेष बस सेवा शुरू की गई थी. बाद में जब राजधानी इस्लामाबाद स्थानांतरित हुई, तो यह ऐतिहासिक पैलेस लंबे समय तक उपेक्षित रहा.
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