सिर्फ भाषा नहीं, भावों की अभिव्यक्ति है हिंदी, जानिए विश्व हिंदी दिवस का महत्व
हिंदी भाषा ऐसी है कि जिसने भी समझा, वह उसके दिल में बस गई. जब भारत में अनेक भाषाएं हैं, फिर भी हिंदी भाषा के लिए आंदोलन चलाने वाले अधिकतर भारतीयों की मातृभाषा भी हिंदी नहीं थी. सुभाष चंद्र बोस, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, काका साहब कालेलकर और राजगोपालाचार्य, सभी ने हिंदी भाषा, उसके संरक्षण और संवर्धन के लिए काम किया. इस संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका खुद जिक्र किया था.
हिंदी भाषा ही नहीं भावों की अभिव्यक्ति है, सदियों से हर भारतीय के शब्दों की शक्ति है." भारत की अनेकता को एकता के सूत्र में पिरोने वाली हिंदी आज मात्र देश तक सीमित नहीं है. यह विश्व में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, जो हमारे पारंपरिक ज्ञान, प्राचीन सभ्यता और आधुनिक प्रगति के बीच एक सेतु भी है. हर साल 10 जनवरी को 'विश्व हिंदी दिवस' हर भारतीय को हिंदी भाषा की सांस्कृतिक विरासत और वैश्विक महत्व पर गर्व के साथ हिंदी के विस्तार के लिए और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.
वैश्विक महत्व
गौरवान्वित महसूस होता है, जब हिंदी यूनेस्को की 9 कामकाजी भाषाओं में से एक के रूप में चुनी और गिनी जाती है. बहुत सरल, सहज और सरल भाषा होने के साथ हिंदी ऐसी वैज्ञानिक भाषा है, जिसे दुनियाभर में समझने, बोलने और चाहने वाले लोग बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं. आज दुनिया में 100 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलते या समझ लेते हैं.
पिछले साल जब वैश्विक भाषाई कुंजी के रूप में हिंदी की महत्ता का जश्न संयुक्त राष्ट्र ने भी मनाया, तब संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत पी हरीश ने 'विश्व हिंदी दिवस' के उस दिन की याद दिलाई, जब संयुक्त राष्ट्र महासभा में 1949 में पहली बार हिंदी बोली गई थी. हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के शैक्षणिक व सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने 1948 में हिंदी को अपनी आधिकारिक भाषाओं की सूची में शामिल किया था. तभी से भारत और पड़ोसी देशों में यूनेस्को का बहुत सारा काम हिंदी में किया जाता है.
भारत में पहली बार हिंदी दिवस वर्ष 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी को मनाया था. तभी से यह दिवस 'विश्व हिंदी दिवस' के रूप में मनाया जाता रहा है.
संविधान में हिंदी
संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल 21 भाषाओं के साथ हिंदी का एक विशेष स्थान है. हिंदी के विकास के लिए खासतौर से राजभाषा विभाग का गठन किया गया. भारत सरकार का राजभाषा विभाग इन प्रयासों में जुटा है कि केंद्र सरकार के अधीन कार्यों में अधिक से अधिक काम हिंदी भाषा में हों.
हिंदी भाषा ऐसी है कि जिसने भी समझा, वह उसके दिल में बस गई. जब भारत में अनेक भाषाएं हैं, फिर भी हिंदी भाषा के लिए आंदोलन चलाने वाले अधिकतर भारतीयों की मातृभाषा भी हिंदी नहीं थी. सुभाष चंद्र बोस, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, काका साहब कालेलकर और राजगोपालाचार्य, सभी ने हिंदी भाषा, उसके संरक्षण और संवर्धन के लिए काम किया. इस संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका खुद जिक्र किया था.
पिछले एक दशक में भारत सरकार ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है. खासकर संयुक्त राष्ट्र व अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इसकी मान्यता और इसके प्रयोग को बढ़ाने के लिए लगातार कदम उठाए गए हैं. सितंबर 2024 में ‘बहुभाषिकता' पर संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव में हिंदी भाषा का उल्लेख किया गया, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक संचार विभाग को प्रोत्साहित किया गया कि वे अपने महत्वपूर्ण संचार और संदेशों का प्रसार हिंदी समेत आधिकारिक और गैर-आधिकारिक भाषाओं में जारी रखें.
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