हरियाणा की जीत ने मिटा दी बीजेपी और संघ के बीच की दूरियां, महाराष्ट्र और झारखंड में भी 'गेमचेंजर' साबित होगी जुगलबंदी?
हरियाणा में जहां-जहां बीजेपी पिछड़ रही थी, वहां आरएसएस ने पैठ मजबूत करने में मदद की. बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा को संघ से ऐसा ही समर्थन महाराष्ट्र और झारखंड में भी मिलेगा?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) में अनबन की खबरें खूब चलीं. दोनों भगवा संगठनों के नेताओं ने ऐसे बयान दिए जिससे लगा कि कुछ तो गड़बड़ है. जो भी मतभेद रहे हों, हरियाणा में मिली चुनावी जीत ने सब दूर कर दिया. बीजेपी ने हरियाणा में जीत की हैट्रिक लगाई तो उसके पीछे आरएसएस की जमीन पर मेहनत भी थी. हरियाणा के चुनावी नतीजों ने सबको चौंकाया, लेकिन उससे बीजेपी-आरएसएस को यह अहसास जरूर करवाया कि दोनों एक-दूसरे पर कितना निर्भर हैं. अब जब दूरियां काफी हद तक मिट चुकी हैं, संघ और भाजपा की जुगलबंदी महाराष्ट्र और झारखंड में भी असर दिखा सकती है.
परिवार में मतभेद होना स्वाभाविक'
पिछले दिनों, उत्तर प्रदेश के मथुरा में संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक हुई. इसमें RSS महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि भाजपा और संघ के बीच सब कुछ ठीक है. होसबोले ने कहा कि परिवार में मतभेद स्वाभाविक हैं और ऐसे मतभेद निजी तौर पर हल किए जाते हैं. संघ सार्वजनिक विवादों में शामिल नहीं होता है.
लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के बयान कि 'बीजेपी को संगठन चलाने के लिए आरएसएस की जरूरत नहीं है क्योंकि वह अब खुद सक्षम है', पर होसबोले ने कहा कि संघ नड्डा के बयान के पीछे की भावनाओं को समझता है. यह स्वतंत्रता को बढ़ावा देने के बारे में है, न कि संबंधों को तोड़ने के बारे में.
क्या लोकसभा चुनाव के नतीजों ने खोलीं आंखें?
लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी और संघ के बीच अनबन की तमाम रिपोर्ट्स आईं. चुनावी नतीजों में लगे झटके ने शायद दोनों संगठनों को समझाया कि भलाई साथ रहने में ही है. मोदी-शाह के युग में बीजेपी पर संघ की पकड़ ढीली पड़ी है, लेकिन हरियाणा में जीत ने साबित कर दिया कि उसका संगठन और नेटवर्क अब भी चुनाव का नतीजा बदलने की ताकत रखता है.
हरियाणा में बीजेपी को 90 में से 44 पर आगे रहने का भरोसा जरूर था, वह कई इलाकों में 'मिसमैनेजमेंट' के चलते पिछड़ती दिख रही थी. 10 साल तक सत्ता में रहने की वजह से एंटी-इनकंबेंसी का फैक्टर भी था. पार्टी कार्यकर्ता भी सुस्त पड़े थे. ऐसे में RSS आगे आया और उसके स्वयंसेवकों ने पूरा गेम ही बदल दिया.
महाराष्ट्र और झारखंड में भी चलेगा संघ का जादू?
बीजेपी को अब महाराष्ट्र में भी ऐसे ही 'गेमचेंजर' प्रदर्शन की आस है. महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी (MVA) का फोकस मराठों और मुसलमानों पर है, उसका मुकाबला करने के लिए बीजेपी को उम्मीद है कि वह ओबीसी समूहों और एससी/एसटी समुदायों को भी एकजुट कर सकेगी. अगर कांग्रेस का महार समुदाय में बड़ा सपोर्ट बेस है, तो आरएसएस ने मातंग समुदाय के साथ संपर्क साधा है.
एकनाथ शिंदे सरकार ने अनुसूचित जाति कोटे के उप-वर्गीकरण पर चर्चा करने के लिए एक समिति नियुक्त करने का फैसला किया. यह कदम कथित तौर पर आरएसएस के दबाव के बाद उठाया गया था. माना जाता है कि अनुसूचित जाति समुदायों के उप-वर्गीकरण पर निर्णय ने हरियाणा में भी बीजेपी की मदद की है
झारखंड में, आरएसएस आदिवासियों के बीच अपने काम की वजह से मजबूत है. उसने आदिवासी बहुल इलाकों में अपने स्वयंसेवकों को छोटी-छोटी इकाइयों में जोड़ा है. कोशिश है कि लोकसभा चुनावों वाली स्थिति को बदला जाए, जब झारखंड में भाजपा सभी पांच आदिवासी बहुल सीटों पर हार गई थी.
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