रास्ते में हैं राहुल इधर ममता ने चुन ली अपनी राह, नीतीश- केजरीवाल क्या करेंगे?

कांग्रेस ने पहले ही तय कर लिया था कि वह करीब 250 सीटों पर चुनाव लड़ेगी लेकिन सीट शेयरिंग अब तक नहीं हो पाई. वास्तव में क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं हैं. अब ममता ने अलग चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है.

Jan 24, 2024 - 14:29
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रास्ते में हैं राहुल इधर ममता ने चुन ली अपनी राह, नीतीश- केजरीवाल क्या करेंगे?

जिसका डर था वही हुआ. कांग्रेस की अगुआई वाला I.N.D.I.A अलायंस 2024 के लोकसभा चुनाव की घोषणा होने से पहले ही बिखर गया है. आज ममता बनर्जी ने बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी. जिस तरह से सीट शेयरिंग में देरी हो रही थी, इसकी आशंकाएं बढ़ती जा रही थीं. यह विपक्षी एकता के लिए बड़ा झटका है. ममता का यह फैसला विशेष रूप से कांग्रेस नेतृत्व की धड़कनें बढ़ाने वाला है क्योंकि अब दूसरी सहयोगी पार्टियां भी 'एकला चलो' की राह ढूंढ सकती हैं. यह खबर ऐसे समय में आई है जब भारत जोड़ो न्याय यात्रा लेकर निकले राहुल गांधी असम पहुंचे हुए हैं. 

क्यों नाराज हुईं ममता

पश्चिम बंगाल में टीएमसी और लेफ्ट एकसाथ नहीं आना चाहती हैं. एक दिन पहले ही ममता ने कहा था कि अपमान के बावजूद मैंने एडजस्ट किया. उन्होंने इंडिया गुट में लेफ्ट कंट्रोल को लेकर चिंता भी जताई थी. आज ममता ने कह दिया कि कांग्रेस ने मेरे सभी प्रस्ताव नहीं माने इसलिए अकेले लोकसभा चुनाव लड़ेंगे.

ममता ने यह भी कहा है कि कांग्रेस ने राहुल गांधी की यात्रा की न जानकारी दी और न ही न्योता दिया. बंगाल की सीएम ने यह भी कहा है कि बीजेपी से लड़ने के लिए जो करना होगा, हम करेंगे. ऐसे में कुछ सियासी जानकार इसे ममता की प्रेशर पॉलिटिक्स भी बता रहे हैं. कांग्रेस भी जानती है कि बंगाल में टीएमसी का दबदबा है. उसे साथ रखने के लिए बातें माननी ही होगी. 

अधीर रंजन चौधरी समेत कांग्रेस के कई नेताओं ने पिछले दिनों टीएमसी पर तीखे हमले किए थे. ऐसे में कुछ लोग मान रहे हैं कि शायद अब ममता का धैर्य जवाब दे गया है. ममता ने राहुल की यात्रा को लेकर अंधेरे में रखने का आरोप मढ़ा है. हो सकता है कि टीएमसी इसे अपने लिए खतरा मान रही हो. 

बीजेपी ने लपका मुद्दा

उधर, बीजेपी के प्रवक्ता नलिन कोहली ने तंज कसा कि राहुल गांधी यात्रा लेकर निकले हैं और ममता जी से कोई बात ही नहीं हुई है तो गठबंधन कहां है? ऐसे में यह तो होना ही था. ये राजनीतिक दल केवल मोदी विरोध में उतरे हैं. इनके पास कोई सकारात्मक एजेंडा नहीं है. इनका न कोई नेता है, न ऑफिस.

बिहार में क्या होगा?

इस राज्य में भी कन्फ्यूजन की स्थिति बनी हुई है. जेडीयू ने यहां तक कह दिया है कि बिहार में सीट शेयरिंग जेडीयू और आरजेडी फाइनल करेगी और लालू की पार्टी आगे कांग्रेस से बात करेगी. अब अटकलें लगाई जा रही हैं कि इंडिया गठबंधन के सूत्रधार नीतीश कुमार खुद कहीं एनडीए की नाव में सवार न हो जाएं. पहले गृह मंत्री अमित शाह के रुख में नरमी फिर कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने का फैसला कहीं न कहीं 'बड़े खेल' की तरफ इशारा करता है. नीतीश काफी समय से इसकी मांग कर रहे थे. 

जेडीयू प्रवक्ता केसी त्यागी ने आज कहा कि बिहार में जेडीयू और आरजेडी बड़ी पार्टियां हैं. लालू जी की बड़ी पार्टी है. वह लेफ्ट और कांग्रेस के साथ मिलकर जो फॉर्मूला तय करेंगे वह हमें स्वीकार होगा. हमारे यहां ज्यादा दिक्कत नहीं है. हालांकि उन्होंने सीट शेयरिंग में देरी का ठीकरा आरजेडी और कांग्रेस पर फोड़ दिया. उनके बयान से ऐसा लगा कि क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस को सीटें देने में हिचकिचा रही हैं. जेडीयू ने आज नसीहत दी है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों से नरम रुख रखे.

AAP भी उसी राह पर

वास्तव में सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस पर चौतरफा दबाव बना हुआ है. जेडीयू हो या आम आदमी पार्टी सबकी तरफ से कांग्रेस को सीमित करने की कोशिशें हो रही हैं. कुछ समय पहले पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने पंजाब के सीएम भगवंत मान और पंजाब के मंत्रियों के साथ बैठक की. इस दौरान लोकसभा चुनाव को लेकर चर्चा हुई है. इससे पहले ही मान ने साफ कह दिया था कि पंजाब की सभी 13 सीटों पर आम आदमी पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी. 

सपा का अलग प्रेशर

यूपी में भी सब ठीक नहीं है. 80 में से 70-72 सीटें सपा ही चाहती है. कांग्रेस को केवल 4-5 सीटें देने की बात हो रही है जबकि यूपी कांग्रेस के नेता दिल्ली आकर कम से कम 17-18 सीटों पर लड़ने की मांग कर चुके हैं. अखिलेश यादव एमपी चुनाव के अनुभव से पहले ही नाराज हैं. ऐसे में यूपी में आसानी से सीटों का समझौता होगा, इस पर संशय है. यूपी में अब तक कोई फॉर्मूला नहीं बना है. 

मायावती ऐंगल

अलायंस की दिल्ली बैठक में बसपा को भी शामिल करने की चर्चा चली थी लेकिन सपा ने आपत्ति जताई. बाद में मायावती का बयान आया कि भविष्य में कभी भी किसी की जरूरत पड़ सकती है. अखिलेश और मायावती में जुबानी जंग भी देखी गई. आखिरकार अपने जन्मदिन के दिन मायावती ने अकेले चुनाव में उतरने की घोषणा कर दी जबकि कांग्रेस के नेता बसपा के वोटबैंक को देखते हुए उसे गठबंधन में शामिल करने के पक्ष में थे. मायावती का न जुड़ना भी बीजेपी को फायदा पहुंचा सकता है.  

उधर, महाराष्ट्र में भी सिर्फ दावेदारी हो रही है, बात बनती नहीं दिख रही है. इस तरह से देखें तो विपक्ष के गठबंधन में अभी कई गांठें दिखाई देती हैं. 

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