सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (20 जून, 2025 से 04 जुलाई, 2025 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

Jul 6, 2025 - 19:02
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सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

PPL Copyright Issue | एज़्योर के पक्ष में स्टे के कारण तीसरे पक्षकार को PPL को लाइसेंस शुल्क का भुगतान करने से छूट नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया कि फोनोग्राफिक परफॉरमेंस लिमिटेड (PPL) और एज़्योर हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड के बीच विवाद में 21 अप्रैल, 2025 को दिया गया उसका अंतरिम स्थगन आदेश केवल दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित मुकदमे के पक्षों के बीच ही लागू होगा, तीसरे पक्षकार पर नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने 21 अप्रैल, 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट के उस निर्देश पर रोक लगा दी थी, जिसमें एज़्योर को रिकॉर्डेड म्यूजिक परफॉरमेंस लिमिटेड (RMPL) के टैरिफ के अनुसार गणना की गई अपनी कॉपीराइट की गई वॉइस रिकॉर्डिंग को चलाने के लिए PPL लाइसेंस फीस का भुगतान करने का आदेश दिया गया था, जैसे कि PPL RMPL का सदस्य हो।

Case Title – Phonographic Performance Ltd. v. Azure Hospitality Private Limited

भ्रष्टाचार के मामलों में लोक सेवकों की दोषसिद्धि पर रोक लगाने से न्यायालयों को बचना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया

सुप्रीम कोर्ट यह जांच करेगा कि क्या CrPC की धारा 156(3) के तहत जांच के लिए PC Act के तहत मंजूरी की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PC Act) के तहत दोषी ठहराए गए लोक सेवक की दोषसिद्धि पर यह देखते हुए रोक लगाने से इनकार कर दिया कि न्यायालयों को भ्रष्टाचार के आरोपों में दोषी ठहराए गए लोक सेवकों की दोषसिद्धि पर रोक लगाने से बचना चाहिए।

जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने कहा कि गुजरात हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है, जिसने केवल सजा को निलंबित कर दिया था, लेकिन दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगाई थी।

Case Title – Raghunath Bansropan Pandey v. State of Gujarat

पीड़ित के ब्लड ग्रुप से मिलते-जुलते हथियार की बरामदगी ही हत्या के लिए पर्याप्त नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान राज्य द्वारा दायर अपील खारिज की, जिसमें हत्या के एक आरोपी को बरी किए जाने को चुनौती दी गई। कोर्ट ने कहा कि पीड़ित के रक्त समूह से मिलते-जुलते खून से सने हथियार की बरामदगी ही हत्या के लिए पर्याप्त नहीं है। जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने 15 मई, 2015 को हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा, जिसमें प्रतिवादी पर ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाई गई सजा और आजीवन कारावास खारिज कर दिया गया था। 

Case Title – State of Rajasthan v. Hanuman

अनुबंध पर नियुक्त सरकारी वकील को नियमित नियुक्ति का अधिकार नहीं : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अनुबंध पर कार्यरत लोक अभियोजक (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) की नियमितीकरण की याचिका खारिज कर दी। जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस जॉयमल्या बागची की खंडपीठ ने कहा कि कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ता की नियमित नियुक्ति की मांग वाली याचिका खारिज कर कोई गलती नहीं की। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता स्वयं जिलाधिकारी, पुरुलिया से अनुबंध पर काम जारी रखने की अनुमति मांगता रहा ताकि आजीविका चला सके।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “याचिकाकर्ता ऐसा कोई वैधानिक या संवैधानिक अधिकार स्थापित नहीं कर सका, जिससे उसे नियमितीकरण का लाभ मिल सके। अतिरिक्त लोक अभियोजकों की नियुक्ति प्रक्रिया दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 और राज्य में लागू नियमों के तहत एक संरचित प्रक्रिया है। इस कारण अनुबंध पर कार्यरत व्यक्ति की नियमितीकरण की मांग कानून के विपरीत होगी।” अतः सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसमें कोई दम नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि याचिकाकर्ता को 20 जून, 2014 को जिला मजिस्ट्रेट, पुरुलिया ने असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के रूप में अनुबंध पर नियुक्त किया ताकि एक रिक्त पद को भरा जा सके। उसे प्रति पेशी ₹459 फीस तय की गई थी (अधिकतम दो मामलों के लिए प्रतिदिन)। बाद में उसे रघुनाथपुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में भी मामले सौंपे गए। उसने फीस वृद्धि की मांग की और सेवा नियमित करने के लिए राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण (SAT) में याचिका दाखिल की।

ट्रिब्यूनल ने दिसंबर, 2022 में उसकी याचिका स्वीकार कर ली थी लेकिन न्याय विभाग ने जून 2023 में दावा खारिज कर दिया। फिर उसने दोबारा ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की लेकिन ट्रिब्यूनल ने दोहराया कि उसकी नियुक्ति केवल अनुबंध पर थी और नियमित पद पर नियुक्त व्यक्ति से समान वेतन या नियमितीकरण की मांग कानूनन टिकाऊ नहीं है। हाईकोर्ट ने भी यही दृष्टिकोण अपनाया और कहा कि याचिकाकर्ता फीस में वृद्धि की मांग के लिए सक्षम प्राधिकरण से अनुरोध कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का निर्णय बरकरार रखा।

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