मंदिर की संपत्ति देवता की, सरकार उसकी मालिक नहीं हो सकती; तमिलनाडु सरकार को SC से झटका
तमिलनाडु के एक मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मंदिर की संपत्ति के प्रशासन और नियमन की जिम्मेदारी सरकार को उसका मालिक नहीं बना देती
नई दिल्ली: मंदिर की संपत्ति के मालिकाना हक, संरक्षण और सरकारी कंट्रोल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है. अदालत ने तमिलनाडु के एक मंदिर को लेकर कहा है कि मंदिर की संपत्ति देवता की है और इसे सरकार का नहीं माना जा सकता. बेंच ने कहा कि दान के जरिए देवता को समर्पित संपत्ति दानदाता, पुजारी, ट्रस्टी या राज्य की नहीं रह जाती, बल्कि देवता में निहित हो जाती है. अदालत ने स्पष्ट किया कि मंदिर की संपत्ति का प्रशासन और नियमन करने की सरकार की भूमिका उसे उस संपत्ति का मालिक नहीं बनाती. इसी के साथ अदालत ने तमिलनाडु के एक मंदिर की इनाम भूमि राज्य सरकार को उपहार में देने संबंधी गिफ्ट डीड को अमान्य घोषित कर दिया.
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने तमिलनाडु के मामले में यह फैसला सुनाया. फैसले में मंदिर की संपत्ति की कानूनी स्थिति, ट्रस्टी की जिम्मेदारी और सरकार की भूमिका से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया गया. फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दान के रूप में दी गई संपत्ति दानदाता, पुजारी, ट्रस्टी या राज्य की नहीं रह जाती, बल्कि देवता में निहित हो जाती है. ऐसी संपत्ति की देखरेख करने वाले व्यक्तियों का दायित्व उसे देवता के हित में सुरक्षित रखना है. मंदिर की संपत्ति का प्रबंधन करने वाला व्यक्ति उसका स्वामी नहीं बन जाता. ट्रस्टी को संपत्ति का इस्तेमाल मंदिर और उससे जुड़े धार्मिक उद्देश्यों के हित में करना होता है. वह अपने पद के आधार पर संपत्ति को मनमाने ढंग से किसी दूसरे व्यक्ति या सरकार को नहीं सौंप सकता.
सरकार संरक्षक है, मालिक नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मंदिर की संपत्ति के प्रशासन और नियमन की जिम्मेदारी सरकार को उसका मालिक नहीं बना देती. सरकार का दायित्व ऐसी संपत्तियों का संरक्षण करना है. वह केवल प्रशासनिक अधिकारों के आधार पर मंदिर की जमीन को अपनी संपत्ति मानकर उसका मनमाना हस्तांतरण नहीं कर सकती. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक उद्देश्य का हवाला देकर कानून के विपरीत किए गए हस्तांतरण को वैध नहीं ठहराया जा सकता. सरकारी कार्यालय बनाने की आवश्यकता अपने आप में मंदिर की संपत्ति को मुफ्त में हस्तांतरित करने का कानूनी आधार नहीं बनती.
क्या था मामला?
मामला तमिलनाडु के इरोड जिले के कोडुमुडी गांव स्थित नागापलायम मरियम्मन-पोननाचियम्मन मंदिर की लगभग एक एकड़ 10 सेंट इनाम भूमि से जुड़ा था. अगस्त 2017 में मंदिर के एक अस्थायी ट्रस्टी ने यह जमीन तालुक कार्यालय बनाने के लिए राज्य सरकार को उपहार में दे दी थी. राजस्व अधिकारियों ने भी इस ट्रांसफर को स्वीकार करते हुए जमीन को ट्रांसफर कर दिया था. इस ट्रांसफर को अदालत में चुनौती दी गई. मद्रास हाईकोर्ट ने मार्च 2019 में याचिका खारिज कर दी थी. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.
सरकारी कार्यालय नहीं हटेगा, देना होगा किराया
सुप्रीम कोर्ट ने गिफ्ट डीड रद्द करने के बावजूद जमीन पर पहले से बने तालुक कार्यालय को हटाने का आदेश नहीं दिया. अदालत ने राज्य सरकार को जमीन पर पट्टे के आधार पर बने रहने की अनुमति दी, लेकिन इसके लिए किराया निर्धारित किया. पीठ ने 8 मार्च 2019 से 31,000 रुपये प्रतिमाह किराया देने का निर्देश दिया. साथ ही राज्य सरकार को मंदिर को एक लाख रुपये का हर्जाना भी अदा करने को कहा. किराये की राशि की हर तीन साल में समीक्षा की जाएगी.
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