15,756 करोड़ प्रीमियम, 4,140 करोड़ रुपये क्लेम: फसल बीमा के आंकड़ों ने मध्य प्रदेश में छिड़ी बड़ी बहस
पूर्व मंत्री और कांग्रेस विधायक बाला बच्चन के प्रश्न के जवाब में किसान कल्याण व कृषि विकास मंत्री ऐदल सिंह कंसाना ने अपने लिखित उत्तर में बताया कि पांच वर्षों में केंद्र, राज्य और किसानों के हिस्से को मिलाकर कितना प्रीमियम जमा हुआ.
सूखा, बाढ़ और फसल खराब होने की स्थिति में किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए बनाई गई फसल बीमा योजना अब मध्य प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आ गई है. विधानसभा में पेश किए गए चौंकाने वाले आंकड़ों ने दिखाया है कि 2021 से 2025 के बीच प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत हजारों करोड़ रुपये का प्रीमियम जमा हुआ, जिससे कागज़ों में तो यह राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी वित्तीय योजनाओं में से एक दिखती है.
कांग्रेस विधायक बाला बच्चन का सवाल
पूर्व मंत्री और कांग्रेस विधायक बाला बच्चन के प्रश्न के जवाब में किसान कल्याण व कृषि विकास मंत्री ऐदल सिंह कंसाना ने अपने लिखित उत्तर में बताया कि पांच वर्षों में केंद्र, राज्य और किसानों के हिस्से को मिलाकर कितना प्रीमियम जमा हुआ, फसलवार और वर्षवार कितना क्लेम दिया गया, और यदि 21 दिनों से अधिक देरी होती है तो ब्याज का क्या प्रावधान है.
आंकड़े जिस पैमाने को दिखाते हैं, वह हैरान करने वाला है. पिछले पांच वर्षों में खरीफ और रबी सीजन में सोयाबीन, गेहूं, धान, चना, कपास, मक्का सहित लगभग हर प्रमुख फसल में हर सीजन लाखों किसान जुड़े कागजों पर यह योजना एक विशाल सुरक्षा कवच की तरह दिखती है, लेकिन जब फसलवार आंकड़ों को जोड़ा गया तो तस्वीर में तीखा अंतर भी सामने आया.
सोयाबीन: 11,232 करोड़ प्रीमियम, 3,373 करोड़ रुपये क्लेम
2021 से 2025 के बीच सोयाबीन के लिए कुल मिलाकर लगभग 2.71 करोड़ किसान प्रविष्टियां दर्ज हुईं. इस अवधि में सोयाबीन बीमा के तहत कुल 11,232 करोड़ रुपये का प्रीमियम जमा हुआ. इसके मुकाबले कुल क्लेम भुगतान लगभग 3,373 करोड़ रुपये रहा. करीब 72 से 73 लाख किसानों को मुआवजा मिला. यानी पांच वर्षों में सोयाबीन के लिए जमा प्रीमियम का लगभग 30 प्रतिशत ही क्लेम के रूप में किसानों तक लौटा.
गेहूं: 4,524 करोड़ प्रीमियम, 760-770 करोड़ रुपये क्लेम
गेहूं की स्थिति और भी ज्यादा अंतर दिखाती है. 2021 से 2025 के बीच गेहूं के लिए लगभग 3.58 करोड़ किसान प्रविष्टियां दर्ज हुईं. कुल प्रीमियम ₹4,524 करोड़ जमा हुआ, लेकिन कुल क्लेम भुगतान केवल 760 से 770 करोड़ रुपये के बीच रहा. लगभग 48 से 50 लाख किसानों को मुआवजा मिला. यहां क्लेम-टू-प्रीमियम अनुपात करीब 17 प्रतिशत तक सिमट जाता है.
यदि केवल सोयाबीन और गेहूं को जोड़ें तो, कुल बीमा प्रविष्टियां लगभग 6.29 करोड़, कुल प्रीमियम संग्रह 15,756 करोड़ रुपये और कुल क्लेम भुगतान लगभग 4,140 करोड़ रुपये हैं. यानी इन दो फसलों में ही पांच वर्षों के दौरान लगभग 11,600 करोड़ रुपये अधिक प्रीमियम जमा हुआ, जितना क्लेम के रूप में वितरित नहीं हुआ.
विधानसभा में रखे गए आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि कुछ वर्षों में भारी नुकसान की स्थिति में क्लेम भुगतान तेजी से बढ़ा. एक सोयाबीन सीजन में क्लेम 1,400 करोड़ रुपये से अधिक पहुंचा. कुछ गेहूं सीजनों में मुआवजा 1,000 करोड़ रुपये से ऊपर गया. यही वजह है कि फसल बीमा को आपदा के समय “जीवनरेखा” कहा जाता है.
लेकिन पांच वर्षों का विश्लेषण यह भी दर्शाता है कि प्रीमियम संग्रह और क्लेम भुगतान के बीच बड़ा अंतर बना रहा और वर्ष दर वर्ष क्लेम में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला. विपक्ष का आरोप है कि हर साल हजारों करोड़ रुपये की प्रीमियम राशि जमा होती है, लेकिन किसानों को समय पर और वास्तविक नुकसान के अनुरूप मुआवजा नहीं मिलता. उनका सवाल है कि क्या प्रीमियम और क्लेम के बीच संतुलन न्यायसंगत है?
सरकार का कहना है कि क्लेम पूरी तरह अधिसूचित उपज आकलन के आधार पर तय होते हैं और नियमों के अनुसार भुगतान किया जाता है. साथ ही यदि निर्धारित समय सीमा से अधिक देरी होती है तो ब्याज वसूलने का भी प्रावधान है. कृषि-प्रधान मध्यप्रदेश के लिए, जहां मौसम की अनिश्चितता हमेशा बनी रहती है, फसल बीमा सिर्फ एक योजना नहीं बल्कि अस्तित्व का सहारा है. जब यह व्यवस्था सुचारु चलती है तो किसानों को झटकों से बचाती है. जब इसमें गड़बड़ी होती है तो संकट गहराता है.
अब विधानसभा में दर्ज ये आंकड़े एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं क्या फसल बीमा योजना किसानों की आय को स्थिर कर पा रही है, या क्लेम में तीखे उतार-चढ़ाव और प्रीमियम-क्लेम अंतर व्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों की ओर इशारा करते हैं? आंकड़े सार्वजनिक हैं. बहस तेज हो चुकी है और लाखों किसान हर मौसम की तरह इस बार भी आसमान की ओर देख रहे हैं.
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