ये IPO क्या होता है? कंपनी इसे क्यों लॉन्च करती है? शेयर अलॉट होने से लिस्टिंग तक क्या होता है
Jio का IPO आज खूब चर्चा में है. IPO आखिर होता क्या है? किसी भी कंपनी को आईपीओ लॉन्च करने की जरूरत क्यों पड़ती है? इसमें निवेशक कौन होते हैं. आपके पैसे लगाने के बाद आपको शेयर मिलने की पूरी प्रक्रिया कैसे काम करती है?
बिजनेस और शेयर बाजार जगत से जुड़े या इसमें रत्ती भर भी दिलचस्पी रखने वाले हर शख्स की जुबान पर आज एक ही नाम छाया हुआ है- जियो का आईपीओ. रिलायंस ग्रुप की टेक कंपनी Jio ने बाजार में नया रिकॉर्ड बनाया है. 21 अक्टूबर के दिन सुबह IPO के लॉन्च होने के 100 मिनट के अंदर ही यह पूरी तरह से सब्सक्राइब हो गया. कंपनी का 30 हजार 213 करोड़ रुपये का ऑफर देश में आजतक का सबसे बड़ा इश्यू है. ज्यादा टेक्निकल टर्म्स में जाने से पहले जान लेते हैं कि IPO आखिर होता क्या है? किसी भी कंपनी को आईपीओ लॉन्च करने की जरूरत क्यों पड़ती है? इसमें निवेशक कौन होते हैं. आपके पैसे लगाने के बाद आपको शेयर मिलने की पूरी प्रक्रिया कैसे काम करती है?
भारतीय शेयर बाजार में पिछले कुछ सालों में रिटेल इन्वेस्टर्स की रुचि तेजी से बढ़ी है. बाजार में चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र अक्सर IPO होता है, जिसका फुल फॉर्म Initial Public Offering होता है. आए दिन किसी ना किसी कंपनी का आईपीओ बाजार में आता है और निवेशकों को कम समय में बड़ा मुनाफा कमाने का मौका देता है.
आईपीओ क्या है?
जब कोई प्राइवेट कंपनी अपनी कंपनी के शेयर यानी मालिकाना हक को आम जनता और निवेशकों को पहली बार बेचती है तो इस प्रक्रिया को इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) कहा जाता है. जब तक कोई कंपनी प्राइवेट होती है, उसके शेयर केवल कुछ चुनिंदा प्रमोटर्स या निवेशकों के पास होते हैं. जब कंपनी को अपने बिजनेस को बढ़ाने, कर्ज चुकाने या नए प्रॉजेक्ट्स के लिए बड़े फंड की जरूरत होती है, तो वह शेयर बाजार में लिस्ट होने का फैसला करती है और आईपीओ लाती है.
आईपीओ आने के बाद से वह कंपनी प्राइवेट लिमिटेड से पब्लिक लिमिटेड बन जाती है और उसके शेयर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज यानी BSE और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी NSE पर खरीदे-बेचे जा सकते हैं.
कंपनियां क्यों लाती हैं IPO?
कोई भी कंपनी आईपीओ क्यों लाती है, इसके कुछ खास मकसद होते हैं. पहला है पूंजी जुटाना. अपने बिजनेस का विस्तार करने, नई फैक्ट्रियां लगाने, रिसर्च एंड डेवलपमेंट या फिर ग्लोबल मार्केट में उतरने के लिए पैसों की जरूरत होती है. इसके लिए कैपिटल रेजिंग की जाती है. दूसरी वजह कर्ज से मुक्ति होती है. कई कंपनियां आईपीओ से मिलने वाले फंड का इस्तेमाल अपने ऊपर चढ़े भारी-भरकम कर्ज को चुकाने के लिए करती हैं.
प्रमोटर्स और शुरुआती इन्वेस्टर्स को एग्जिट देना. जिन शुरुआती निवेशकों ने कंपनी के शुरुआती दौर में पैसा लगाया था, वे आईपीओ के जरिए अपने शेयर बेचकर मुनाफा कमाते हैं. इससे मार्केट में साख के साथ ही ट्रांसपैरैंसी भी बढ़ती है. शेयर बाजार में लिस्ट होने से कंपनी की फाइनैंशियल स्थिति पारदर्शी हो जाती है, जिससे बैंक से लोन मिलना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रांड वैल्यू बढ़ना आसान हो जाता है.
आईपीओ आने से पहले क्या तैयारी की जाती है?
कोई भी आईपीओ रातों-रात बाजार में नहीं आ जाता है. इसके पीछे कई महीनों की लंबी कानूनी और वित्तीय प्रक्रिया होती है. इनको स्टेप बाई स्टेप समझते हैं.
मर्चेंट बैंकर्स की नियुक्ति: कंपनी सबसे पहले मर्चेंट इनवेस्टमेंट बैंकर्स को अपॉइंट करती है जो आईपीओ लाने का पूरा फ्रेमवर्क तैयार करते हैं.
DRHP फाइलिंग: कंपनी इसके लिए सेबी यानी Securities and Exchange Board of India (SEBI) के पास एक ड्राफ्ट दस्तावेज जमा करती है, जिसे DRHP (Draft Red Herring Prospectus) कहा जाता है. इसमें कंपनी का पूरा इतिहास, फाइनेंशियल सेहत, जोखिम और फंड के इस्तेमाल की जानकारी होती है.
सेबी की मंजूरी: इसके बाद SEBI इससे जुड़े सभी दस्तावेजों की काफी बारीकी से जांच करता है. कमियों को दूर करने के बाद सेबी आईपीओ को हरी झंडी देता है.
IPO लॉन्च होने से शेयर अलॉटमेंट तक की प्रक्रिया
एक बार जब आईपीओ जनता के लिए खुलता है, तो बिडिंग से लेकर शेयर मिलने तक का सफर कई सारे फेज में पूरा होता है.
1. प्राइस बैंड और आईपीओ ओपनिंग: कंपनी और उसके मर्चेंट बैंकर्स मिलकर शेयर की कीमत का दायरा तय करते हैं, जिसे Price Band कहते हैं. जैसे 500 से 530 रुपये तक प्रति शेयर. इसके साथ ही निवेशकों को न्यूनतम शेयरों का एक लॉट खरीदना होता है. आईपीओ आमतौर पर 3 से 5 दिनों के लिए खुलता है.
2. इन्वेस्टर्स की तरफ से बोलियां लगाना: कोई भी निवेशक अपनी डीमैट (Demat) और ट्रेडिंग अकाउंट के जरिए आईपीओ के लिए बोली लगाते हैं. डीमैट अकाउंट किसी बैंक या ब्रोकर ऐप के जरिए खोला जा सकता है. ये खास तौर पर शेयर, म्युचुअल फंड, ETF को डिजिटल फॉर्मेट में सेफ रखा जाता है. इसके लिए नेट बैंकिंग या UPI का यूज करके निवेशक अलग-अलग कैटेगरी में अप्लाई करते हैं.
QIB: इसका मतलब Qualified Institutional Buyers होता है. इसमें बड़े वित्तीय संस्थान और म्यूचुअल फंड शामिल होते हैं.
HNI और NII: इसमें हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स यानी लार्ज रिटेल निवेशक होते हैं. इसमें इसके साथ ही नॉन इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स भी होते हैं.
रिटेल इन्वेस्टर्स (RII): इसमें आम नागरिक भी होते हैं, जो अधिकतम 2 लाख रुपये तक का इन्वेस्ट कर सकते हैं.
3. IPO क्लोजिंग और सब्सक्रिप्शन: तय तारीख पर शाम को आईपीओ बंद हो जाता है. इसके बाद यह देखा जाता है कि आईपीओ को कुल कितनी बोलियां मिलीं. अगर आईपीओ 5 गुना भरा है, तो उसे 5x Subscribed कहा जाता है. मांग अगर बहुत ज्यादा होती है, तो ओवर-सब्सक्रिप्शन की स्थिति बनती है, जहां सभी को शेयर मिलना मुश्किल हो जाता है.
शेयर अलॉटमेंट की प्रक्रिया, कैसे मिलता है शेयर?
आईपीओ बंद होने के आमतौर पर 3 से 4 दिनों के अंदर शेयर अलॉटमेंट को अंतिम रूप दिया जाता है. कंप्यूटर आधारित लॉटरी सिस्टम के तहत अगर आईपीओ में डिमांड की संख्या उपलब्ध शेयरों से कई गुना अधिक होती है, तो अलॉटमेंट एक कंप्यूटरीकृत लॉटरी प्रॉसेस के तहत किया जाता है.
किसी आईपीओ को अगर भारी ओवर-सब्सक्रिप्शन मिलता है, तो रिटेल निवेशकों को लॉट मिलना किस्मत पर निर्भर करता है. इसको लॉटरी सिस्टम से समझ सकते हैं. जिन निवेशकों को शेयर अलॉट नहीं होते, उनका होल्ड किया गया पैसा उनके बैंक अकाउंट में वापस रिफंड कर दिया जाता है.
रिफंड और डीमैट में शेयरों का क्रेडिट
जिन लोगों को शेयर अलॉट हो जाते हैं, उनके शेयर अलॉटमेंट के अगले दिन उनके डीमैट अकाउंट में ट्रांसफर कर दिए जाते हैं. वहीं दूसरी तरफ जिन्हें शेयर नहीं मिलते, उनके बैंक खाते से अनब्लॉक हुआ पैसा कुछ ही घंटों के अंदर फ्री हो जाता है.
स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टिंग कब?
अलॉटमेंट प्रक्रिया पूरी होने के आम तौर पर 2 से 3 दिनों के अंदर कंपनी के शेयर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) पर ट्रेड होने के लिए लिस्ट हो जाते हैं. अगर कंपनी का प्रदर्शन अच्छा होता है और बाजार का मूड पॉजिटिव रहता है, तो शेयर अपने इश्यू प्राइस से अधिक कीमत पर लिस्ट होते हैं, जिसे निवेशकों का मुनाफा या लिस्टिंग गेन कहा जाता है.
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