NI Act की धारा 138 की शर्तें पूरी होने पर चेक बाउंस की शिकायत को ट्रायल से पहले के स्टेज पर रद्द नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Apr 7, 2026 - 20:43
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NI Act की धारा 138 की शर्तें पूरी होने पर चेक बाउंस की शिकायत को ट्रायल से पहले के स्टेज पर रद्द नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब Negotiable Instruments Act, 1881 (NI Act) की धारा 138 की बुनियादी शर्तें पूरी हो जाती हैं तो चेक बाउंस के मामले को ट्रायल से पहले के स्टेज पर इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि चेक किसी कानूनी रूप से लागू होने वाले कर्ज़ के लिए जारी नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि चेक किसी कानूनी रूप से लागू होने वाले कर्ज़ के लिए जारी किया गया या नहीं, यह ट्रायल का मामला है, और इसे ट्रायल से पहले के स्टेज पर तय नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा, “जब धारा 138 की बुनियादी शर्तें पूरी हो जाती हैं और धारा 139 के तहत कानूनी अनुमान लागू हो जाता है तो ट्रायल से पहले के स्टेज पर ही यह नतीजा निकालना कि चेक किसी कानूनी रूप से लागू होने वाले कर्ज़ के लिए जारी नहीं किया गया—बिना शिकायतकर्ता को सबूत पेश करके अपना मामला साबित करने का मौका दिए—उस कानूनी अनुमान को नज़रअंदाज़ करने जैसा होगा कि चेक किसी कानूनी रूप से लागू होने वाले कर्ज़ या देनदारी के लिए जारी किया गया। नतीजतन, NI Act की धारा 139 के तहत अनुमान ट्रायल शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता है।”

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने उस मामले की सुनवाई की, जो एक वैवाहिक समझौते के विवाद से जुड़ा था, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसके पति ने ₹50 करोड़ देने पर सहमति जताई। एक तीसरे पक्ष ने गारंटर के तौर पर काम करते हुए उसके पक्ष में उतनी ही रकम का चेक जारी किया। जब चेक पेश किया गया तो वह “चेक जारी करने वाले ने पेमेंट रोक दिया” (Payment Stopped by Drawer) की टिप्पणी के साथ बाउंस हो गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने NI Act की धारा 138 के तहत कानूनी कार्रवाई शुरू की।

एक मजिस्ट्रेट ने मामले का संज्ञान लिया और चेक जारी करने वाले के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया। हालांकि, सेशंस कोर्ट ने यह मानते हुए उक्त आदेश रद्द किया कि चेक किसी “कानूनी रूप से लागू होने वाले कर्ज़” के लिए जारी नहीं किया गया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इस विचार को सही ठहराया, जिसके बाद शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। अपील मंज़ूर करते हुए जस्टिस चांदुरकर द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि एक बार जब धारा 139 के तहत कानूनी अनुमान लागू हो जाता है तो शिकायत को शुरुआती स्टेज पर ही खारिज नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब उस अनुमान को चुनौती न दी गई हो—जो कि ट्रायल के दौरान किया जाएगा।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए, “एक बार जब शिकायतकर्ता द्वारा NI Act की धारा 138 की बुनियादी शर्तें पूरी कर दी जाती हैं तो चेक जारी करने वाला (Drawer) कानूनी अनुमान का खंडन केवल ट्रायल के दौरान ही कर सकता है।” अदालत ने यह भी कहा, “शिकायत खारिज करना—एक आपराधिक अपील के तौर पर, जो प्रक्रिया जारी करने वाला आदेश रद्द करने के परिणामस्वरूप सामने आई—पूरी तरह से अनुचित है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि दूसरे प्रतिवादी ने कानूनी अनुमान का खंडन करने और अपने इस दावे को साबित करने के लिए कोई भी सामग्री रिकॉर्ड पर पेश नहीं की कि चेक किसी भी लागू होने योग्य ऋण या दायित्व के बदले जारी नहीं किया गया।” उपर्युक्त बातों के आधार पर अपील स्वीकार कीगई। चेक अनादरण (Cheque Dishonour) की कार्यवाही रद्द करने का बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसले निरस्त कर दिया गया और मामले को मजिस्ट्रेट के समक्ष उसकी मूल स्थिति में बहाल कर दिया गया।

Cause Title: RENUKA VERSUS THE STATE OF MAHARASHTRA & ANR.

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