बिना लाइसेंस वाले साहूकारों के खिलाफ जांच के लिए नए कानून का इंतज़ार ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Apr 8, 2026 - 19:57
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बिना लाइसेंस वाले साहूकारों के खिलाफ जांच के लिए नए कानून का इंतज़ार ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में साफ किया कि बिना इजाज़त के पैसे उधार देने के मामले में खुद से शुरू की गई (suo motu) कार्रवाई को बंद करने वाले उसके पिछले आदेश का यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि इस विषय पर अभी कोई कानून मौजूद नहीं है, या यह कि कानून लागू करने वाली कार्रवाई के लिए राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा नए कानून बनाने का इंतज़ार करना होगा। अदालत ने साफ किया कि बिना लाइसेंस वाले साहूकारों के खिलाफ राज्यों के पैसे उधार देने से जुड़े कानूनों और भारतीय न्याय संहिता के तहत मौजूदा प्रावधानों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

अदालत ने कहा: "यह ध्यान देना ज़रूरी है कि बिना लाइसेंस के पैसे उधार देने के मामले में अगर यह प्रॉमिसरी नोट (वचन पत्र) के आधार पर दिया गया- चाहे इसके साथ कोई दूसरी ज़मानत (जैसे चेक, संपत्ति के कागज़ात) हो या न हो - तो राज्यों के पैसे उधार देने से जुड़े कानूनों में पहले से ही इस पर कानूनी रोक लगी हुई है। पैसे उधार देने का लाइसेंस होने पर भी 'दम दुपट' का नियम लागू होता है, यानी मूल रकम से ज़्यादा ब्याज़ वसूलने पर रोक होती है। इसके अलावा, बिना लाइसेंस वाले साहूकार द्वारा दिए गए कर्ज़ की वसूली पर भी कानूनी रोक लगी हुई है। साथ ही राज्यों के पैसे उधार देने से जुड़े कानूनों के तहत इस तरह पैसे उधार देना एक दंडनीय अपराध है।"

इसलिए अदालतों को बिना लाइसेंस वाले निजी साहूकारों द्वारा शुरू की गई कानूनी कार्रवाई को राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा नए कानून बनाने का इंतज़ार किए बिना "शुरू में ही खत्म" कर देना चाहिए। जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा, "इसलिए अदालतों को यह पक्का करना चाहिए कि ऐसे निजी साहूकारों द्वारा शुरू की गई कानूनी कार्रवाई - चाहे वह दीवानी (Civil) हो या फौजदारी (Criminal) - शुरू में ही खत्म कर दी जाए। सिवाय इसके कि साहूकार शुरुआत में ही पैसे उधार देने का लाइसेंस पेश कर दे, या यह साबित कर दे कि उसने पैसे ब्याज़ पर नहीं दिए।"

अदालत ने आगे कहा, "...राज्यों के पैसे उधार देने से जुड़े कानूनों और भारतीय दंड संहिता, 1860/भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत बिना लाइसेंस वाले साहूकार द्वारा किए गए किसी भी दंडनीय अपराध की जांच शुरू करने के लिए भी संबंधित राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा कानून बनाने का इंतज़ार नहीं किया जाएगा।" यह आदेश एक विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) में दायर एक विविध आवेदन (Miscellaneous Application) पर दिया गया, जिसमें चेक बाउंस होने के एक मामले में जारी समन को रद्द करने की मांग की गई।

जुलाई, 2024 में अदालत ने समाज में गैर-कानूनी तरीके से पैसे उधार देने की बुराई से निपटने के लिए मुख्य मामले में खुद से कार्रवाई (suo motu action) शुरू की थी। अदालत ने बिना लाइसेंस के पैसे उधार देने की बढ़ती बुराई पर रोशनी डाली, जिसके कारण कर्ज़ लेने वालों को गंभीर नतीजे भुगतने पड़ते हैं - जिनमें आर्थिक बर्बादी और यहां तक कि आत्महत्या भी शामिल है। कोर्ट ने पाया कि बिना सही लाइसेंस के ब्याज पर पैसे उधार देना और लोन के बदले चेक या प्रॉपर्टी के कागज़ात (टाइटल डीड) सिक्योरिटी के तौर पर रखना, पैसे उधार देने के धंधे से अलग नहीं है। हालांकि, पंजाब रजिस्ट्रेशन ऑफ़ मनी लेंडर्स एक्ट, 1938 के तहत ऐसी गतिविधियों को पैसे उधार देने का धंधा तब तक नहीं माना जाएगा, जब तक कि उनमें एक ही तरह के लगातार लेन-देन शामिल न हों। कोर्ट ने पाया कि कानून से बचने के लिए ऐसे लोग सिर्फ़ रुक-रुककर ही लोन देते हैं। कोर्ट ने ऐसे उधार देने वालों की तुलना शेक्सपियर के नाटक 'मर्चेंट ऑफ़ वेनिस' के किरदार शाइलॉक से की, जो नाटक के मुख्य किरदार को सिक्योरिटी के तौर पर "एक पाउंड मांस" के बदले लोन देता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे शाइलॉक जैसे उधार देने वालों को बिना रोक-टोक अपना काम जारी रखने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। इन चिंताओं को देखते हुए कोर्ट ने खुद ही (suo motu) भारत सरकार और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) दिल्ली की सरकार को इस मामले में पक्षकार बना लिया। इसके बाद भारत सरकार ने कोर्ट को बताया कि वह बिना लाइसेंस के पैसे उधार देने के धंधे को कंट्रोल करने के लिए एक नया कानून लाने की सोच रही है, खासकर तब, जब बहुत ज़्यादा ब्याज दरें वसूली जा रही हों। इस साल फ़रवरी में कोर्ट ने खुद से शुरू की गई इस कार्रवाई (suo motu action) को बंद कर दिया और यह दर्ज किया कि कानून लाने वाले राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) के बीच एक ड्राफ़्ट बिल सर्कुलेशन में था।

कोर्ट ने कहा, "भारत सरकार ने हमारे सामने जो रुख़ अपनाया, उसे देखते हुए हम इस कोर्ट द्वारा शुरू की गई suo motu कार्रवाई को बंद करने का निर्देश देते हैं। साथ ही उम्मीद करते हैं कि सभी राज्य/केंद्र शासित प्रदेश पैसे उधार देने के गैर-कानूनी धंधे पर सख़्ती से रोक लगाने के लिए एक सही और उचित कानून लाएंगे।" कोर्ट ने फ़रवरी के आदेश में यह कहा था, जिसके ज़रिए यह कार्रवाई बंद की गई थी। इसके बाद फ़रवरी के आदेश पर स्पष्टीकरण मांगते हुए यह मौजूदा विविध अर्ज़ी (Miscellaneous Application) दायर की गई, क्योंकि उस आदेश का मतलब यह समझा जा रहा था कि बिना लाइसेंस के पैसे उधार देने के ख़िलाफ़ कोई कानून मौजूद नहीं है। साथ ही सभी कार्रवाइयों को राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा नया कानून बनाए जाने तक इंतज़ार करना होगा। इसी पृष्ठभूमि में कोर्ट ने अपने मौजूदा आदेश में राज्यों के पैसे उधार देने से जुड़े कानूनों के तहत पहले से मौजूद कानूनी रोक (Statutory Bars) पर ज़ोर दिया।

Case Title: RAJ KUMAR SANTOSHI VERSUS PRASHANT MALIK, Miscellaneous Application No. 1176/2026 in SLP(Crl) No. 5485/2024

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